इबादत पर पहरा: यरुशलम में पाम संडे भी ‘इजाज़त’ का मोहताज?

सदियों से आस्था और इबादत का केंद्र रहा यरुशलम इस बार पाम संडे पर एक चौंकाने वाले विवाद का गवाह बना। यरुशलम गवर्नरेट के मुताबिक, इज़राइली ऑक्यूपेशन अथॉरिटी यानी (IOA) ने चर्च ऑफ द होली सेपुल्चर में होने वाली पारंपरिक मास को आयोजित होने से रोक दिया! यह एक ऐसा कदम, जिसे सीधे तौर पर धार्मिक स्वतंत्रता पर प्रहार बताया जा रहा है।

गवर्नरेट का कहना है कि लैटिन पैट्रिआर्क कार्डिनल पियरबत्तिस्ता पिज़्ज़ाबल्ला और होली लैंड के कस्टोस फादर फ्रांसेस्को इएलपो को चर्च तक पहुंचने ही नहीं दिया गया। सवाल यह उठता है कि क्या अब यरुशलम में इबादत भी “इजाज़त” की मोहताज हो गई है?

इस कार्रवाई को गवर्नरेट ने अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवीय सिद्धांतों का “खुला उल्लंघन” करार दिया है। उनके अनुसार, यह न सिर्फ धार्मिक स्थलों तक निर्बाध पहुंच के ऐतिहासिक अधिकारों के खिलाफ है, बल्कि एक खतरनाक संकेत भी है कि पवित्र स्थलों की स्थिति को बदला जा रहा है।

गवर्नरेट ने साफ शब्दों में कहा कि कब्जे वाले यरुशलम और उसके इस्लामिक व ईसाई पवित्र स्थलों पर इज़राइल का कोई संप्रभु अधिकार नहीं है। इसके बावजूद अगर इबादत के रास्ते रोके जाते हैं, तो यह केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि एक सोची-समझी नीति का हिस्सा लगता है।

बयान में यह भी आरोप लगाया गया कि यह कदम एक “सिस्टमेटिक पॉलिसी” को दर्शाता है—जिसका मकसद धार्मिक स्वतंत्रता को कमजोर करना और पवित्र स्थलों के प्रबंधन पर नियंत्रण स्थापित करना है। और चिंताजनक बात यह है कि इसमें इस्लामिक और ईसाई—दोनों ही स्थलों को एक साथ निशाना बनाया जा रहा है।

यरुशलम गवर्नरेट ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से तीखी अपील करते हुए कहा कि अब “चुप्पी” नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई की जरूरत है, ताकि ऐसी घटनाओं को रोका जा सके और सभी के लिए इबादत की आज़ादी सुनिश्चित हो सके।

अंत में एक स्पष्ट संदेश दिया गया! यरुशलम की पहचान, उसकी आस्था और उसका इतिहास किसी दबाव या पाबंदी से नहीं बदला जा सकता। सवाल अब यह है कि क्या दुनिया इस पुकार को सुनेगी, या फिर आस्था पर लगते ये पहरे यूं ही जारी रहेंगे?

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