पाकिस्तान की मध्यस्थता बनाम भारत की खामोशी: क्या डॉ. एस. जयशंकर की कूटनीति पर उठते सवाल?

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अवसर अक्सर संकट के रूप में सामने आते हैं। जो देश इन संकटों को संवाद, मध्यस्थता और नेतृत्व के अवसर में बदल देते हैं, वही वैश्विक मंच पर अपनी असली ताकत दिखाते हैं। हाल ही में अमेरिका–ईरान तनाव के बीच पाकिस्तान द्वारा मध्यस्थ की भूमिका निभाना इसी का एक उदाहरण बनकर उभरा है। यह घटनाक्रम सिर्फ पाकिस्तान की कूटनीतिक सक्रियता को नहीं दिखाता, बल्कि भारत की विदेश नीति को लेकर भी कई अहम सवाल खड़े करता है।

भारत लंबे समय से खुद को एक उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता रहा है। “वसुधैव कुटुंबकम्” और “ग्लोबल साउथ की आवाज़” जैसे विचारों के जरिए भारत ने नैतिक और राजनीतिक नेतृत्व का दावा किया है। लेकिन जब वास्तविक संकट सामने आता है, तब क्या भारत उस नेतृत्व को व्यवहार में बदल पाता है? यही वह सवाल है जो आज चर्चा का विषय बन गया है।

अमेरिका–ईरान जैसे संवेदनशील मुद्दे पर मध्यस्थता करना आसान नहीं है। इसके लिए भरोसा, संतुलन और सक्रिय कूटनीतिक नेटवर्क की जरूरत होती है। पाकिस्तान ने, अपनी सीमित वैश्विक साख के बावजूद, इस मौके को भुनाने की कोशिश की और खुद को बातचीत के एक माध्यम के रूप में प्रस्तुत किया। इससे यह संकेत जाता है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर सक्रियता और पहल दिखाना कितना महत्वपूर्ण है, भले ही देश की आंतरिक या बाहरी चुनौतियाँ कुछ भी हों।

इसके विपरीत, भारत इस पूरे घटनाक्रम में अपेक्षाकृत शांत नजर आया। भारत के पास अमेरिका और ईरान दोनों के साथ मजबूत संबंध हैं एक तरफ रणनीतिक साझेदारी, तो दूसरी तरफ ऐतिहासिक और ऊर्जा आधारित रिश्ते। ऐसे में भारत के पास एक स्वाभाविक मध्यस्थ बनने की क्षमता थी। लेकिन इस दिशा में कोई ठोस पहल सामने नहीं आई। यह चुप्पी कई सवाल खड़े करती है क्या भारत जोखिम लेने से बच रहा है? या फिर हमारी विदेश नीति में वह आक्रामकता और लचीलापन नहीं है, जो आज के दौर में जरूरी है?

विदेश नीति केवल संबंध बनाए रखने का नाम नहीं है, बल्कि समय आने पर निर्णायक भूमिका निभाने का भी नाम है। अगर भारत वैश्विक नेतृत्व का दावा करता है, तो उसे कठिन परिस्थितियों में आगे बढ़कर समाधान का हिस्सा बनना होगा। केवल बयान देना या तटस्थ रहना पर्याप्त नहीं है।

यहीं पर डॉ. एस. जयशंकर की भूमिका पर भी चर्चा होना स्वाभाविक है। एक अनुभवी राजनयिक और विदेश मंत्री के रूप में उनसे अपेक्षा की जाती है कि भारत की कूटनीति अधिक सक्रिय और प्रभावशाली दिखे। उनके नेतृत्व में भारत ने कई मोर्चों पर सफलता भी हासिल की है, लेकिन ऐसे महत्वपूर्ण वैश्विक संकटों में भारत की अनुपस्थिति या सीमित भूमिका चिंता का विषय बनती है। क्या यह उनकी कूटनीति की रणनीतिक चूक नहीं मानी जानी चाहिए?

हालांकि, इस आलोचना के साथ यह समझना भी जरूरी है कि हर देश अपनी प्राथमिकताओं और सीमाओं के आधार पर निर्णय लेता है। भारत के लिए क्षेत्रीय स्थिरता, आर्थिक हित और घरेलू चुनौतियाँ भी महत्वपूर्ण हैं। फिर भी, एक उभरती शक्ति के रूप में भारत से यह अपेक्षा की जाती है कि वह केवल दर्शक न बने, बल्कि सक्रिय भागीदार बने।

आज की दुनिया में शक्ति का अर्थ सिर्फ सैन्य या आर्थिक ताकत नहीं है, बल्कि कूटनीतिक प्रभाव और संवाद की क्षमता भी है। जो देश बातचीत की मेज तैयार करता है, वही असली खेल बदलता है। पाकिस्तान का यह कदम, चाहे वह कितना भी सीमित या प्रतीकात्मक क्यों न हो, इस बात की याद दिलाता है कि वैश्विक राजनीति में सक्रियता ही पहचान बनाती है।

अंततः, यह समय भारत के लिए आत्ममंथन का है। क्या हम अपने कूटनीतिक संसाधनों का पूरा उपयोग कर रहे हैं? क्या हम सही समय पर सही पहल कर पा रहे हैं? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या हम वास्तव में उस वैश्विक भूमिका को निभा रहे हैं, जिसका हम दावा करते हैं?

इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि आने वाले समय में भारत सिर्फ एक संभावित शक्ति रहेगा, या एक वास्तविक वैश्विक नेता बनकर उभरेगा।

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