कब्ज़े वाले यरुशलम में अल-अक़्सा मस्जिद एक बार फिर तनाव का केंद्र बन गया, जब प्रो-अक़्सा एक्टिविस्ट मुन्तहा अमारा को मस्जिद में नमाज़ अदा करने के लिए पहुंचने पर इज़राइली पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। यह घटना उस दिन हुई जब 40 दिनों तक बंद रहने के बाद मस्जिद को दोबारा खोला गया था एक ऐसा पल, जिसका इंतज़ार हजारों नमाज़ी कर रहे थे।
मुन्तहा अमारा के मुताबिक, उन्होंने सभी सुरक्षा जांच पार कर ली थीं, लेकिन बाब हिट्टा इलाके में पहुंचते ही उन्हें अचानक हिरासत में ले लिया गया। उन्हें क़िशला पुलिस स्टेशन ले जाया गया, जहां कई घंटों तक रोके रखा गया। रिहाई तो मिली, लेकिन इसके साथ एक शर्त भी एक हफ्ते तक मस्जिद में प्रवेश पर रोक, और अगले हफ्ते फिर से पेश होने का आदेश। उन्हें यह भी बताया गया कि यह पाबंदी आगे चलकर छह महीने तक बढ़ सकती है।
यह सिर्फ एक गिरफ्तारी नहीं, बल्कि उस बड़े विवाद की झलक है जो इस पवित्र स्थल को लेकर लंबे समय से चल रहा है। अमारा ने साफ कहा कि मौजूदा हालात में मस्जिद पर पूरी तरह इज़राइली नियंत्रण महसूस होता है, जबकि जॉर्डन की संरक्षक भूमिका अब सिर्फ प्रतीकात्मक लगती है।
इसी बीच, जैसे ही मस्जिद के दरवाज़े फज्र की अज़ान के साथ खुले, बड़ी संख्या में फ़िलिस्तीनी नमाज़ी वहां पहुंचे। कई लोगों की आंखों में आंसू थे, और उन्होंने सज्दा-ए-शुक्र अदा कर अपने जज़्बात जाहिर किए। यह दृश्य बताता है कि अल-अक़्सा सिर्फ एक इबादतगाह नहीं, बल्कि आस्था और पहचान का गहरा प्रतीक है।
मुन्तहा अमारा ने अपने इरादे साफ करते हुए कहा कि अगर उन्हें मस्जिद के अंदर जाने से रोका गया, तब भी वह उसके सबसे नज़दीकी स्थान पर नमाज़ पढ़ेंगी! क्योंकि उनके लिए इस पवित्र जगह से जुड़ाव किसी भी पाबंदी से बड़ा है।
