मध्य पूर्व में तेल व गैस संकट के बाद अब खनिजों की कमी पर बढ़ी चिन्ता

मध्य पूर्व में युद्ध के कारण होर्मुज़ जलक्षेत्र (Strait of Hormuz) में उत्पन्न हुए नौवहन संकट ने एक नए ख़तरे को जन्म दिया है और वो है – रणनैतिक खनिजों की औचक कमी जिनकी, दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं को चलाने में अहम भूमिका है. अब इन खनिजों को हासिल करने करने के लिए देशों के बीच होड़ मची हुई है.

संयुक्त राष्ट्र के योरोप आर्थिक आयोग (UNECE) ने कहा है कि 28 फ़रवरी को ईरान पर इसराइल और संयुक्त राज्य अमेरिका की बमबारी और उसके बाद खाड़ी देशों में ईरान के जवाबी हमलों के साथ युद्ध शुरू होने से पहले तक, प्रमुख खनिजों और सम्बन्धित उत्पाद विशाल मात्रा में उपलब्ध थे.

मगर युद्ध जारी रहने से, सेमीकंडक्टर से लेकर सौर ऊर्जा पैनल तक, हर चीज़ का उत्पादन सुनिश्चित करने के लिए कच्चे माल को प्राप्त करने का दबाव बढ़ गया है. 

इसके परिणामस्वरूप उपभोक्ता वस्तु बाज़ारों में क़ीमतें बढ़ गई हैं और नए उत्पादन स्थलों की ओर ध्यान केन्द्रित होने की सम्भावना है, जहाँ भू-राजनैतिक अनिश्चितता कम है. 

इससे उन देशों की संख्या बढ़ सकती है दुर्लभ खनिजों का प्रसंस्करण कर सकते हैं.

योरोप के लिए यूएन आर्थिक आयोग (UNECE) के सतत ऊर्जा विभाग के निदेशक डारियो लिगूटी का कहना है, “खाड़ी युद्ध का प्रभाव केवल ऊर्जा बाज़ार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह, तेल से प्राप्त होने वाले सल्फ़र, हीलियम और नेफ़्था जैसे कुछ उप-उत्पादों को भी प्रभावित कर रहा है.”

ये सभी, तेल शोधन (oil refining) के उप-उत्पाद हैं और उर्वरकों से लेकर कीटनाशकों, प्लास्टिक व माचिस के साथ-साथ शीतलन और सेमीकंडक्टर उत्पादन जैसे क्षेत्रों में उपयोग किए जाते हैं. नेफ़्था तेल शोधन का एक अन्य उप-उत्पाद है और रसायन उद्योग का एक प्रमुख आधार है.

डारियो लिगूटी का मानना है कि, “पहली प्रतिक्रिया, बेशक क़ीमतों में वृद्धि के अलावा, यह होगी कि उद्योग इनके उपयोग को कम करेंगे और इसलिए भविष्य में सौर ऊर्जा पैनल, मैग्नेट, बैटरी आदि का उत्पादन कम हो जाएगा.”

युद्ध से पहले, धातुओं के प्रसंस्करण में उपयोग होने वाले दुनिया के कुल सल्फ़र उत्पादन का 30 प्रतिशत हिस्सा होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से होकर गुजरता था. लेकिन वह तब था जब इस महत्वपूर्ण व्यापारिक जलमार्ग से प्रतिदिन लगभग 140 जहाज] गुजरते थे. 

आज की वास्तविकता ये है कि जहाज़ों पर हमलों और होर्मुज़ जल क्षेत्र के उपयोग को लेकर, ईरान व अमेरिका के बीच जारी गतिरोध के कारण नौवहन लगभग ठप है.

नवीकरणीय ऊर्जा की तरफ़ बदलाव पर असर

UNECE के अधिकारियों का कहना है कि यदि युद्ध इसी तरह जारी रहता है तो प्रमुख खनिजों की कमी खुलकर सामने आएगी, जिससे उद्योगों को नवीकरणीय ऊर्जा उपकरणों और डिजिटल तकनीक में उपयोग किए जाने वाले महत्वपूर्ण खनिजों के उत्पादन को “कम करने के लिए मजबूर” होना पड़ेगा. 

“इसलिए समय के साथ, इसका पहले क़ीमतों पर और फिर उन उपकरणों की उपलब्धता पर प्रभाव बढ़ता जाएगा.”

डारियो लिगूटी ने कहा कि आज जो उद्योग होर्मुज़ जलक्षेत्र से होने वाली आपूर्ति पर निर्भर थे, “वे अपने मौजूदा भंडार का उपयोग कर रहे हैं और अन्य स्थानों पर उत्पादन बढ़ा रहे हैं.”

उन्होंने दुनिया भर के कई सदस्य देशों द्वारा “इन खनिजों को सुरक्षित करने के अभियान” की तरफ़ ध्यान आकर्षित किया, जिसके परिणामस्वरूप देश, भविष्य में इसी तरह के व्यवधान से बचने के लिए तेज़ी से “रणनैतिक भंडार” बनाएंगे.

“अब तक, यह स्थिति कुछ क्षेत्रीय बाज़ारों में अनुभव की जा रही है, विशेष रूप से दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्वी एशिया में, जहाँ इन प्रारम्भिक वस्तुओं का बहुत अधिक शोधन व प्रसंस्करण होता है. लेकिन समय के साथ, इसका भौगोलिक दायरा और बड़ा हो जाएगा.”

डारियो लिगूटी ने ध्यान दिलाया कि युद्ध की भारी मानवीय क्षति के अलावा, तेल और प्राकृतिक गैस संकट, किस तरह वैश्विक स्तर पर हरित ऊर्जा स्रोतों की ओर बदलाव को कमज़ोर करने का जोखिम उत्पन्न करता है.

उन्होंने कहा कि दुनिया देख सकती है कि एक संकट जो मुख्य रूप से पुराने पारम्परिक जीवाश्म ईंधन क्षेत्र पर केन्द्रित है, वह किस तरह, नई नवीकरणीय ऊर्जा और उस बदलाव (transition) को प्रभावित करता है जिसे दुनिया अपना रही है. जबकि वास्तव में नवीकरणीय ऊर्जा की तरफ़ बदलाव में तेज़ी लाने की आवश्यकता है, क्योंकि दुनिया 2030 के विकास लक्ष्यों में पीछे छूट रहे हैं.

ध्यान दिला दें कि यूएन योरोप आर्थिक आयोग (UNECE) योरोप, उत्तरी अमेरिका और एशिया के 56 सदस्य देश शामिल हैं; यह आयोग महत्वपूर्ण कच्चे माल को संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के साथ मिलाने के प्रयास कर रहा है.

Source : UN news

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