संयुक्त राज्य अमेरिका ने वॉशिंगटन डीसी में हुई वार्ता के बाद, इसराइल और लेबनान के बीच युद्धविराम की अवधि को तीन सप्ताह के लिए बढ़ाने की घोषणा की है. वहीं, ईरान में कई सप्ताह तक जारी रहे हिंसक टकराव के बाद नाज़ुक परिस्थितियों में युद्धविराम लागू है लेकिन वहाँ अति-आवश्यक स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं पर दबाव बढ़ रहा और ज़रूरी चिकित्सा सामग्री की क़िल्लत होने की आशंका है.
28 फ़रवरी को, इसराइल व संयुक्त राज्य अमेरिका ने ईरान पर हवाई बमबारी शुरू किए की थी. उसके बाद ईरान ने जवाबी ड्रोन व मिसाइल हमले किए थे, जिसकी चपेट में खाड़ी क्षेत्र में स्थित देश भी आए.
5 सप्ताह से अधिक समय तक टकराव के बाद, अमेरिका और ईरान के बीच 8 अप्रैल से दो सप्ताहों के लिए युद्धविराम पर सहमति बनी थी, जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति ने बुधवार को फिर कुछ समय के लिए बढ़ाने की घोषणा की थी.
संयुक्त राष्ट्र के साझीदार संगठन, अन्तरराष्ट्रीय रैड क्रॉस व रैड क्रेसेंट सोसाइटीज़ फ़ेडरेशन (IFRC) की वरिष्ठ अधिकारी क्रिस्थियान कोर्टेज़ कार्डोज़ा ने बताया कि इस महीने की शुरुआत में युद्धविराम की घोषणा एक स्वागत योग्य राहत थी.
“मगर, ज़मीन पर वास्तविकता बहुत ही अलग है.”
मध्य पूर्व व उत्तर अफ़्रीका के लिए IFRC की क्षेत्रीय उप निदेशक ने लेबनान की राजधानी बेरूत से जानकारी देते हुए बताया कि युद्धविराम का अर्थ यह नहीं है कि हिंसक टकराव समाप्त हो गया है.
कई सप्ताह के इस भीषण टकराव के नतीजे, ईरान के समाज द्वारा अगले कई महीनों, वर्षों तक महसूस किए जाते रहेंगे.
उन्होंने हाल ही में ईरान की राजधानी तेहरान का दौरा करके वहाँ हालात का जायज़ा लिया.
IFRC अधिकारी ने बताया कि ईरान में सैकड़ों स्वास्थ्य केन्द्र क्षतिग्रस्त या ध्वस्त हो गए हैं. मेडिकल सेवाओं की सुलभता और ज़रूरी सामान जैसेकि डायलिसिस मशीन की क़िल्लत होने की आशंका है, चूँकि उनके निर्माण केन्द्रों को क्षति पहुँची है.
IFRC क्षेत्रीय उप निदेशक के अनुसार, उनकी एक फ़ैक्ट्री के ज़रिए ईरान में लगभग 60 प्रतिशत डायलिसिस फ़िल्टर की आपूर्ति की जाती थी, लेकिन युद्ध की वजह से अब केवल 3 महीनों के निर्माण के लिए ही बुनियादी उपकरण बचे हैं.
ग़ाज़ा में नाज़ुक स्थिति

इस बीच, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने चिन्ता जताई है कि ग़ाज़ा पट्टी में 1,800 से अधिक स्वास्थ्य केन्द्र आशिंक या पूर्ण रूप से बर्बाद हो चुके हैं, जिनमें ग़ाज़ा सिटी में स्थित अल शिफ़ा जैसे बड़े अस्पताल और छोटे स्तर पर संचालित होने वाले प्राथमिक केन्द्र हैं.
क़ाबिज़ फ़लस्तीनी इलाक़े के लिए WHO की नए प्रतिनिधि डॉक्टर रेनहिल्डे वान डे विर्ड्ट ने अपना नया दायित्व संभालने के बाद ग़ाज़ा का दौरा किया और वहाँ स्थिति पर जानकारी दी.
“मैंने इस महीने के शुरू में ग़ाज़ा में अपना पहला सप्ताह बिताया और जिस तरह से वहाँ बर्बादी हुई है, उसे देखने के लिए आप किसी भी तरह से तैयार नहीं हो सकते हैं.”
“आप रिपोर्ट पढ़ सकते हैं, आँकड़ों का अध्ययन कर सकते हैं, लेकिन सड़कों पर दूर-दूर तक कई मीटर लम्बे मलबे के ढेर के बीच में खड़ा होना पूरी तरह से अलग अनुभव है.”
ग़ाज़ा में अब भी, अधिकाँश फ़लस्तीनी परिवार विस्थापित हैं, उन्हें मलबे के बीच टैंट में रहना पड़ रहा है और वे अपनी दैनिक आवश्यकताओं के लिए मानवीय सहायता पर निर्भर हैं. 80 प्रतिशत से अधिक विस्थापन स्थलों पर त्वचा संक्रमण जैसेकि स्केबीज़, जुएँ समेत अन्य मामले सामने आए हैं.
बिना फटे विस्फोटकों का जोखिम
क़ाबिज़ फ़लस्तीनी इलाक़े में, बारूदी सुरंग के विरुद्ध कार्रवाई के लिए यूएन सेवा (UNMAS) के प्रमुख जूलिसय डर्क वान डेर वॉल्ट ने बताया कि ग़ाज़ा में बिना फटी हुई विस्फोटक सामग्री बिखरी हुई है, जोकि यहाँ हमेशा मौजूद रहने वाला ख़तरा है.
उन्होंने कहा कि अभी हम पूरी तरह से जान ही नहीं पाए हैं कि ग़ाज़ा में किस स्तर पर इस आयुध सामग्री का दूषण है और हम किसका सामना कर रहे हैं.
लेकिन, उनके अनुसार यह पता है कि यह निरन्तर बदलने वाला एक ख़तरा है. अपने घर लौटने वाले परिवार, अपने घर की ओर जा रहा एक पिता, उन्हें हैंड ग्रेनेड मिलती है तो वे उसे जल्दी से अपने घर से दूर कर देना चाहते हैं.
Source : UN News
