बंगाल क्यों पिछड़ गया?

2006 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में लेफ्ट फ़्रंट को 235 सीटें मिली थीं. तब लेफ्ट फ़्रंट की सरकार को करीब 30 साल हो गए थे. मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य को लगा कि बिना इंडस्ट्री के विकास नहीं होगा. कोलकाता के पास सिंगुर में टाटा मोटर्स को नैनो कार का कारख़ाना लगाने के लिए ज़मीन दी गई. नंदीग्राम में केमिकल हब बनाने के लिए ज़मीन अधिग्रहण किया गया. लेफ्ट फ़्रंट की पॉलिसी में यह बड़ा बदलाव था.तब तक बड़े उद्योगों की जगह छोटे कुटीर उद्योगों को प्राथमिकता देने की नीति थी.

बंगाल के लिए यह परिवर्तन ज़रूरी था, लेकिन ज़मीन अधिग्रहण का विरोध शुरू हो गया. TMC की नेता ममता बनर्जी लेफ्ट को हटाने के लिए 15 साल से कोशिश कर रहीं थीं लेकिन सफल नहीं हो सकीं थीं. ममता ने मौक़े का फ़ायदा उठाया. आंदोलन को हवा दी. टाटा को प्लांट बनने से पहले ही बंद करना पड़ा . नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे. उन्होंने टाटा संस के चेयरमैन रतन टाटा को SMS किया . Welcome to Gujarat. हफ़्ते भर में टाटा मोटर्स ने गुजरात में कारख़ाना खोलने का फ़ैसला कर लिया. तब ख़बरें छपी थी कि मोदी SMS पर एक रुपया खर्च कर इतना बड़ा इन्वेस्टमेंट ले आएँ. 

सिंगुर और नंदीग्राम आंदोलन ने लेफ्ट फ़्रंट को बंगाल में खत्म कर दिया. 2011 में बंगाल में TMC की सरकार बनी . लेफ्ट कभी नहीं लौट पाया. ममता नारा था परिवर्तन. 15 साल बाद परिवर्तन का यही नारा TMC की हार का कारण बन गया क्योंकि आर्थिक नीतियों में परिवर्तन हुआ नहीं. लेफ्ट की आर्थिक नीतियों को ममता बनर्जी ने कमोबेश जारी रखा. लक्ष्मी भंडार जैसी कल्याणकारी योजनाओं पर सरकार ने खर्च किया. बड़ी इंडस्ट्री बंगाल में नहीं आई बल्कि जो कंपनियाँ थीं वो भागने लगीं. सरकार ने संसद में बताया था कि 2011 से 2025 के बीच करीब 7 हज़ार कंपनियों ने बंगाल से अपना रजिस्टर्ड ऑफिस दूसरे राज्यों में शिफ़्ट कर दिया. इसमें 110 कंपनियाँ शेयर बाज़ार में लिस्ट हैं. 

नतीजा देखिए गुजरात की प्रति व्यक्ति आय बंगाल से दोगुनी है. कोलकाता की तुलना कभी मुंबई से होती थी. 1961 में बंगाल की प्रति व्यक्ति आय देश के पहले पांच राज्यों में थी और अब अंतिम पांच राज्यों में. बीजेपी ने घोषणा पत्र में एक बड़ा वादा किया है कि सिंगुर में इंडस्ट्रियल पार्क बनाया जाएगा. यह प्रतीकात्मक है क्योंकि सिंगुर से टाटा जाने के झटके से बंगाल आज तक उबर नहीं पाया है. बात सिर्फ प्रतीकों की नहीं है. बंगाल में परिवर्तन ज़मीन पर तभी आएगा जब आर्थिक नीतियों में बदलाव आएगा. 

हिसाब किताब में अर्थव्यवस्था और कंपनियों के अलावा टेक्नोलॉजी को भी समझने समझाने की कोशिश है.

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