इस्लाम और दस्तूर: इंसाफ़ और बराबरी के उसूल

(मुदससिर अशरफी)

संविधान किसी भी जम्हूरी समाज के लिए महज़ एक क़ानूनी दस्तावेज़ नहीं होता, बल्कि वह इंसाफ़, बराबरी, आज़ादी, इंसानी गरिमा और क़ानून की बालादस्ती जैसी बुनियादी क़दरों की बुनियाद तय करता है। भारत जैसे बहुलतावादी मुल्क में इन क़दरों की अहमियत और भी बढ़ जाती है। दिलचस्प बात यह है कि इस्लामी तालीमात में भी इंसाफ़, धार्मिक मामलों में जब्र से परहेज़, अमानत और क़ानून के सामने जवाबदेही जैसे उसूलों पर ज़ोर दिया गया है। इसलिए यह कहना दुरुस्त होगा कि इस्लाम की बुनियादी अख़लाक़ी और सामाजिक तालीमात कई ऐसी क़दरों को मज़बूत करती हैं जो एक दस्तूरी और जम्हूरी समाज के लिए अहम हैं। हालांकि आधुनिक संविधान और इस्लामी फ़िक़्ह अलग-अलग ऐतिहासिक और क़ानूनी परंपराओं से विकसित हुए हैं, इसलिए दोनों को बिल्कुल एक जैसा समझना भी सही नहीं होगा।

इंसाफ़: दस्तूरी निज़ाम की बुनियाद: क़ुरआन इंसाफ़ को इंसानी समाज की बुनियादी ज़रूरत के तौर पर पेश करता है। सूरह अन-नहल में कहा गया है: “बेशक अल्लाह इंसाफ़ और एहसान का हुक्म देता है।” (क़ुरआन 16:90), सिर्फ़ अपने लोगों के साथ नहीं, बल्कि मुख़ालिफ़ के साथ भी इंसाफ़ करने की ताकीद की गई है। सूरह अल-माइदा में साफ़ कहा गया: “किसी क़ौम की दुश्मनी तुम्हें इस बात पर आमादा न करे कि तुम इंसाफ़ न करो। इंसाफ़ करो, यही तक़वा के ज़्यादा क़रीब है।” (क़ुरआन 5:8) यह उसूल आधुनिक संवैधानिक व्यवस्था में क़ानून की बालादस्ती और निष्पक्ष न्याय की अहमियत से गहरा संबंध रखता है।

इंसानी बराबरी और गरिमा: क़ुरआन इंसानों की बुनियादी बराबरी पर भी ज़ोर देता है। सूरह अल-हुजुरात में कहा गया: “ऐ लोगो! हमने तुम्हें एक मर्द और एक औरत से पैदा किया और तुम्हें क़बीलों और बिरादरियों में इसलिए बांटा ताकि तुम एक-दूसरे को पहचानो। अल्लाह के नज़दीक तुममें सबसे इज़्ज़त वाला वह है जो सबसे ज़्यादा परहेज़गार है।” (क़ुरआन 49:13) इस आयत का केंद्रीय पैग़ाम यह है कि नस्ल, क़बीला, रंग या सामाजिक पहचान इंसान की बुनियादी इंसानी क़ीमत का पैमाना नहीं होनी चाहिए। रसूलुल्लाह ﷺ ने अपने आख़िरी ख़ुत्बे में भी इंसानों की बराबरी पर ज़ोर दिया और नस्ल तथा क़बीले की बुनियाद पर श्रेष्ठता के दावे को ख़ारिज किया।

यह तसव्वुर आधुनिक समाज में बराबरी और भेदभाव से परहेज़ की क़दर से जुड़ता है।
धार्मिक आज़ादी और जब्र से परहेज़: क़ुरआन का एक बेहद मशहूर उसूल है: “दीन के मामले में कोई ज़बरदस्ती नहीं।” (क़ुरआन 2:256) यह आयत धार्मिक विश्वास के मामले में जब्र के बजाय इख़्तियार और क़नाअत की अहमियत को बयान करती है। इसी तरह सूरह यूनुस में रसूल ﷺ से कहा गया: “क्या तुम लोगों को मजबूर करोगे कि वे मोमिन हो जाएँ?” (क़ुरआन 10:99) इस्लामी तालीमात में दावत का तरीका भी हिकमत और अच्छे अंदाज़ पर आधारित बताया गया है। क़ुरआन कहता है: “अपने रब के रास्ते की तरफ़ हिकमत और अच्छी नसीहत के साथ बुलाओ।” (क़ुरआन 16:125) यह तालीम धार्मिक मामलों में शांतिपूर्ण संवाद और persuasion की अहमियत को सामने रखती है।

अल्पसंख्यकों और दूसरे मज़ाहिब के साथ इंसाफ़: मदीना के दौर में रसूलुल्लाह ﷺ की सियासी-सामाजिक व्यवस्था का एक अहम पहलू विभिन्न क़बीलों और धार्मिक समुदायों के साथ समझौता था। मिसाक़-ए-मदीना को अक्सर इसी संदर्भ में पेश किया जाता है। इसमें मदीना के विभिन्न समूहों के बीच साझा सुरक्षा और सामाजिक ज़िम्मेदारियों का एक ढांचा स्थापित किया गया। क़ुरआन भी दूसरे मज़हब के लोगों के साथ इंसाफ़ और नेकी से पेश आने की गुंजाइश देता है: “अल्लाह तुम्हें उन लोगों के साथ नेकी और इंसाफ़ करने से नहीं रोकता जिन्होंने तुमसे दीन के मामले में जंग नहीं की।” (क़ुरआन 60:8) यह सिद्धांत एक बहुलतावादी समाज में सह-अस्तित्व और नागरिक बराबरी की अहमियत को समझने में मदद करता है।

अमानत और सार्वजनिक जवाबदेही: संवैधानिक शासन में सार्वजनिक ओहदा एक अमानत माना जाता है। क़ुरआन कहता है: “बेशक अल्लाह तुम्हें हुक्म देता है कि अमानतें उनके हक़दारों तक पहुँचाओ और जब लोगों के बीच फ़ैसला करो तो इंसाफ़ के साथ फ़ैसला करो।” (क़ुरआन 4:58) यह आयत सत्ता और सार्वजनिक ज़िम्मेदारी को निजी मिल्कियत नहीं, बल्कि अमानत और जवाबदेही के रूप में देखने की बुनियाद देती है। रसूलुल्लाह ﷺ ने भी हुक्मरानों को जनता के प्रति ज़िम्मेदार बताया। सहीह अल-बुख़ारी और सहीह मुस्लिम में मशहूर हदीस है: “तुम में हर व्यक्ति निगरान है और हर व्यक्ति से उसकी रिआयत के बारे में सवाल किया जाएगा।” इसमें सार्वजनिक ज़िम्मेदारी और accountability का एक स्पष्ट नैतिक तसव्वुर मिलता है।

मशविरा और सामूहिक फ़ैसला: क़ुरआन मुसलमानों की सामूहिक ज़िंदगी में शूरा यानी मशविरा को भी अहमियत देता है: “और उनके मामले आपस के मशवरे से होते हैं।” (क़ुरआन 42:38) सामूहिक मशविरा, राय सुनना और फ़ैसले में लोगों की भागीदारी एक महत्वपूर्ण इस्लामी सामाजिक क़दर है।आज़ादी के साथ ज़िम्मेदारी: इस्लाम इंसानी आज़ादी को ज़िम्मेदारी से अलग नहीं करता। क़ुरआन झूठ, बदगुमानी, ग़ीबत और बेबुनियाद इल्ज़ाम से बचने की हिदायत देता है। सूरह अल-हुजुरात में ख़बर की तहक़ीक़ का सिद्धांत भी मिलता है: “अगर कोई फ़ासिक़ तुम्हारे पास कोई ख़बर लाए तो अच्छी तरह तहक़ीक़ कर लिया करो।” (क़ुरआन 49:6) आज के डिजिटल दौर में यह तालीम ज़िम्मेदार नागरिकता और misinformation से बचाव के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक है।

इस्लाम की बुनियादी तालीमात में इंसाफ़, बराबरी, इंसानी गरिमा, अमानत, जवाबदेही, मशविरा, धार्मिक मामलों में जब्र से परहेज़ और दूसरे समुदायों के साथ नेकी जैसे उसूल स्पष्ट रूप से मिलते हैं। भारत का संविधान इन क़दरों को एक आधुनिक क़ानूनी और लोकतांत्रिक ढांचे में स्थापित करता है। इसलिए भारतीय मुसलमानों के लिए संविधान की हिफ़ाज़त और संवैधानिक क़दरों को मज़बूत करना केवल एक नागरिक ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि इंसाफ़, अमानत और इंसानी गरिमा जैसी इस्लामी क़दरों की रौशनी में भी समझा जा सकता है।

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