एक शख्स, जिसने अंधेरे में रोशनी जलाई — सैयद नवाज़ मिफ्ताही की अनोखी सफलता कहानी

बेंगलुरु में एक साधारण परिवार में जन्मे सैयद नवाज़ मिफ्ताही आज उन हज़ारों लोगों के लिए उम्मीद बन चुके हैं, जो देखने की क्षमता खोने के बावजूद कुरान और शिक्षा से जुड़ना चाहते हैं। बचपन में पढ़ाई आसान नहीं थी, लेकिन नवाज़ ने रास्ता खुद बनाया। आलिम बनने के बाद उर्दू में एमए किया, और शब्दों की दुनिया ने उनके अंदर नई चमक भर दी।

उनकी असली यात्रा 2011 में शुरू हुई, जब मुंबई के एक सम्मेलन में उन्होंने अंधे बच्चों की तिलावत सुनी। उनकी मासूम आवाज़ों ने नवाज़ का दिल हिला दिया। उसी पल उन्होंने तय किया वे ब्रेल यानी (एक स्पर्शनीय लेखन प्रणाली) सीखेंगे और उन लोगों तक तालीम पहुँचाएँगे, जिन्हें दुनिया अक्सर नजरअंदाज कर देती है।

2012 में उन्होंने सुल्तान शाह मरकज़ में दृष्टिबाधितों की शाखा शुरू की। बड़े उम्र के छात्रों को ब्रेल सिखाने के लिए उन्होंने अनोखी तकनीकें बनाईं, जिनमे शामिल है पिंचिंग तकनीक और कंकी, रागी, जौ से स्पर्श शक्ति बढ़ाने वाले अभ्यास। इन तरीकों ने कई ज़िंदगियाँ बदल दीं। 50 वर्षीय असलम, जो कभी कुरान पढ़ने का सपना भी नहीं देख पाते थे, आज रमज़ान में कई बार कुरान की तिलावत कर लेते हैं।

अब नवाज़ “उमंग फ़ाउंडेशन्स ऑफ़ द ब्लाइंड” के जरिए एक ऐसा केंद्र बना रहे हैं जहाँ हर दृष्टिबाधित व्यक्ति को तालीम, हुनर और आत्मनिर्भरता मिले | नवाज़ की सफलता का संदेश सरल है— “अंधेरा कभी रुकावट नहीं होता, अगर कोई रोशनी जलाने वाला हो।”

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