ग़ाज़ा में सर्दी की बारिश से बिगड़े हालात, पश्चिमी तट में निर्माण कार्य पर चिन्ता

ग़ाज़ा पट्टी में भारी बारिश की वजह से विस्थापन शिविरों में पहले से ही गम्भीर परिस्थितियों में जीवन व्यतीत कर रहे लोगों को अब जलभराव से भी जूझना पड़ रहा है. जबाल्या व ग़ाज़ा सिटी में अनेक इमारतों के ध्वस्त होने की घटनाएँ हुई हैं, जिनमें बच्चों समेत अनेक लोग हताहत हुए हैं. इस बीच, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने क़ाबिज़ पश्चिमी तट में इसराइली बस्तियों के निवासियों के लिए एक तथाकथित सड़क बनाए जाने की ख़बरों पर चिन्ता जताई है.

बताया गया है कि ग़ाज़ा पट्टी में बारिश की वजह से अस्थाई शरण स्थलों में जल भर गया है और लाखों फ़लस्तीनियों के लिए सर्दी के मौसम में नई कठिनाई खड़ी हो गई है. इसकी वजह वहाँ कमज़ोर बुनियादी ढाँचा, निकासी व्यवस्था का अभाव और आश्रय स्थलों में भीड़भाड़ है.

यूएन मानवीय सहायता एजेंसियों ने चेतावनी दी है कि निकासी व्यवस्था के सही ढंग से काम न कर पाने और दूषित जल स्रोतों की वजह से जलजनित बीमारियों का जोखिम बढ़ रहा है.

यूएन मानवतावादी कार्यालय (OCHA) ने बताया कि सीवर सिस्टम की मरम्मत करने के लिए जल्द से जल्द ज़रूरी पुर्ज़ों व मशीनरी की व्यवस्था की जानी होगी, चूँकि कचरा को एकत्र करने व उसके निस्तारण में कठिनाई आ रही है.

सर्दी में पारा गिरने की वजह से, बिना गैस और बिजली के दिन काटने के लिए मजबूर परिवार ठंड से जूझ रहे हैं और सुरक्षित आश्रय की तलाश में हैं.

टैंट की क़िल्लत

मानवीय सहायता एजेंसियाँ ज़रूरतमन्द आबादी में सर्दी के कपड़े, तिरपाल और टैंट वितरित कर रही हैं, लेकिन 13 लाख लोगों को तुरन्त आश्रय सम्बन्धी समर्थन की आवश्यकता है.

ग़ाज़ा में युद्धविराम लागू हुए क़रीब दो महीने बीत चुके हैं, लेकिन 50 हज़ार से कम टैंट ही यहाँ पहुँचाए जा सके हैं, जिससे 2.70 लाख लोगों के लिए व्यवस्था की गई है. 

बड़ी मात्रा में सामान को नकार दिया गया है और कई ग़ैर-सरकारी संगठनों को काम करने की अनुमति नहीं दी गई है.

आपात राहत के लिए यूएन कार्यालय ने ज़ोर देकर कहा है कि सहायता सामान के प्रवेश पर लगाई गई सख़्तियों को वापिस लिया जाना होगा. 

इसके अलावा, फ़लस्तीनी शरणार्थियों के लिए यूएन एजेंसी, UNRWA पर से पाबन्दी भी हटानी होगी, जोकि वहाँ राहत अभियान के लिए मुख्य संगठन है.

क़ाबिज़ पश्चिमी तट में निर्माण कार्य पर चिन्ता

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने क़ाबिज़ पश्चिमी तट में इसराइली बस्तियों के निवासियों के लिए एक तथाकथित सड़क बनाए जाने की ख़बरों पर चिन्ता जताई है.

अभी तक मिली जानकारी के अनुसार, 100 हैक्टेयर फ़लस्तीनी भूमि को ज़ब्त कर लिया गया है, ताकि इस सड़क को तैयार किया जा सके.

क़ाबिज़ फ़लस्तीनी इलाक़े में यूएन मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (OHCHR) के प्रमुख अजीत सुंघाय ने चेतावनी दी है कि यह पश्चिमी तट को चरणबद्ध ढंग से खंडित करने की दिशा में उठाया गया एक क़दम हो सकता है.

उन्होंने चिन्ता जताई कि इसराइल ने एक नए अवरोध और जॉर्डन घाटी के केन्द्र में सड़क का निर्माण कार्य वास्तव में शुरू कर दिया है.

“यह पश्चिमी तट में सबसे उर्वर भूमि है और इस सड़क से फ़लस्तीनी समुदायों के एक दूसरे से अलग हो जाने की सम्भावना है…” और टुबास इलाक़े में फ़लस्तीनी किसान, अवरोध के दूसरी ओर स्थित अपनी ज़मीन से भी दूर हो सकते हैं.

यूएन के वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, इस क़दम से पश्चिमी तट में भूमि के इसराइल द्वारा हरण को मज़बूती मिलेगी और फ़लस्तीनियों के लिए आजीविकाओं के सभी स्रोत ख़त्म हो जाएंगे. 

अजीत सुंघाय ने बताया कि जिनीन, तुलकरेम और नूर शम्स शिविरों को भी खाली कराया जा चुका है और लगभग एक वर्ष बीत जाने के बाद भी, निवासियों को वापिस नहीं लौटने दिया गया है.

महासभा का समर्थन

इस बीच, यूएन महासभा ने शुक्रवार को अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय के उस आदेश का समर्थन किया, जिसमें कहा गया है कि ग़ाज़ा में फ़लस्तीनी शरणार्थियों के लिए यूएन एजेंसी (UNRWA) में हमास चरमपंथियों की घुसपैठ होने के दावों में ठोस साक्ष्य नहीं मिले हैं.

यूएन एजेंसी के महाआयुक्त फ़िलिपे लज़ारिनी ने अपने एक ट्वीट सन्देश में बताया कि महासभा में इस प्रस्ताव को 139 सदस्य देशों का समर्थन मिला है. साथ ही, उन आरोपों को भी ख़ारिज किया गया जिनके अनुसार ग़ाज़ा पट्टी में मुख्य सहायता संगठन तटस्थ नहीं है.

महाआयुक्त लज़ारिनी ने कहा कि यह वोट UNRWA के लिए अन्तरराष्ट्रीय समुदाय के विशाल समर्थन का एक अहम संकेत है.

“जैसाकि अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय ने ज़ोर देकर कहा है, UNRWA क़ाबिज़ फ़लस्तीनी इलाक़े में एक मुख्य मानवतावादी पक्ष है और इसके कामकाज को आगे बढ़ाने के लिए हरसम्भव क़दम उठाए जाने चाहिएं, न कि उसमें बाधा या रोकना चाहिए.”

12 देशों ने इस प्रस्ताव के विरोध में मतदान किया, जबकि 19 देशों ने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया. विरोध में मतदान करने वाले देशों में संयुक्त राज्य अमेरिका, अर्जेन्टीना, बोलिविया और हंगरी समेत अन्य देश थे. 

Source: UN News Hindi

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