शरीफा ख़ानम: मुस्लिम महिलाओं की हक़ की आवाज़

तमिलनाडु के एक छोटे गाँव में जन्मी, डी. शरीफा ख़ानम ने अपने जीवन की शुरुआत कठिनाइयों और सीमाओं के बीच की। दस बच्चों में सबसे छोटी, और एक अकेली मां के संघर्षों को नज़दीक से देखती हुई, उन्होंने बचपन में ही समाज में पुरुष प्रधानता और पितृसत्ता को सामान्य माना। लेकिन शिक्षा और अनुभव ने उन्हें यह एहसास दिलाया कि हर महिला की अपनी पहचान है, और उसे केवल दूसरों की अपेक्षाओं के अनुसार जीना नहीं चाहिए।

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पढ़ाई करते हुए, और बाद में पटना में महिलाओं के सम्मेलन में अनुवादक के रूप में काम करते हुए, शरीफा ने देखा कि महिलाएं हर जगह हर समुदाय और हर राज्य में समान रूप से पीड़ित हैं। यह समझ उनके भीतर एक सशक्त इच्छाशक्ति में बदल गई: वह न केवल खुद अपनी “फेयरी गॉडमदर” बनें, बल्कि दूसरों के लिए भी आशा बनें।

1987 में, पुडुच्चेरी में उन्होंने छोटे स्तर पर काम शुरू किया। पढ़ाई और साड़ी बेचने से जो साधन जुटे, उनका उपयोग उन्होंने महिलाओं की मदद के लिए किया। यही छोटी कोशिश धीरे-धीरे STEPS यानि (Society for Transformation, Empowerment, Participation, and Sustenance) में बदल गई। महिलाएं अपने तलाक, घरेलू हिंसा, परित्याग और गरीबी की समस्याएँ लेकर उनके पास आने लगीं। शरीफा ने उन्हें परामर्श, मध्यस्थता और कानूनी मदद के माध्यम से न्याय दिलाना शुरू किया।

साम्प्रदायिक दंगों ने उनके दृष्टिकोण को और स्पष्ट किया। मुस्लिम महिलाओं की समस्याओं को पारंपरिक पुरुष जमातें अक्सर अनसुना कर देती थीं। 1991 में उन्होंने महिलाओं के लिए अपना जमात शुरू किया। यह आगे चलकर 2000 में तमिलनाडु मुस्लिम महिला जमात समिति बन गया, जो महिलाओं को शरिया और कानूनी अधिकारों की जानकारी देता है और उन्हें न्याय दिलाने के लिए काम करता है।

STEPS ने केवल न्याय ही नहीं दिया, बल्कि महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने पर भी ध्यान दिया। समय के साथ यह संगठन वर्तमान में 3,500 से अधिक महिलाओं की मदद कर चुका है, उन्हें सुरक्षित आश्रय और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराता है, और समाज में उनकी आवाज़ बुलंद करता है।

लगभग दो दशकों से, शरीफा ख़ानम महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई में अडिग खड़ी हैं। उनके जीवन का संदेश सरल लेकिन शक्तिशाली है: हर महिला को सम्मान और सुरक्षा मिलनी चाहिए, और जो खुद को हाशिए पर समझती है, वह भी न्याय और अधिकार की हकदार है। उनके संघर्ष और सफलता ने साबित कर दिया कि इच्छाशक्ति और समर्पण से कोई भी महिला समाज में बदलाव ला सकती है।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *