गुलाबी पैकेजिंग की असली कीमत: पिंक टैक्स की अनदेखी सच्चाई

जब आप बाज़ार में रेज़र खरीदने जाते हैं और एक ही कंपनी का पुरुषों के लिए नीला रेज़र और महिलाओं के लिए गुलाबी रेज़र देखते हैं, तो पहली नज़र में फर्क सिर्फ रंग का लगता है। लेकिन बिल हाथ में आते ही पता चलता है कि गुलाबी रंग की कीमत ज़्यादा है। यही से शुरू होती है पिंक टैक्स की कहानी।

पिंक टैक्स कोई सरकारी टैक्स नहीं है, न ही यह बिल में अलग से लिखा होता है। यह दरअसल एक छुपा हुआ मूल्य अंतर है, जो खासतौर पर महिलाओं के लिए बनाए गए उत्पादों और सेवाओं में देखा जाता है। एक जैसी गुणवत्ता, एक जैसा काम — लेकिन सिर्फ “महिलाओं के लिए” होने की वजह से ज़्यादा कीमत।

कंपनियां इसे खुले तौर पर भेदभाव नहीं कहतीं। वे इसे “बेहतर अनुभव”, “जेंटल फॉर्मूला” या “प्रीमियम केयर” जैसे शब्दों में लपेट देती हैं। गुलाबी पैकेजिंग, मुलायम शब्द और आकर्षक विज्ञापन यह एहसास दिलाते हैं कि यह उत्पाद अलग है — जबकि हकीकत में फर्क बहुत मामूली या कई बार बिल्कुल नहीं होता।

अंतर सिर्फ कुछ रुपयों का नहीं होता। कई उपभोक्ता अध्ययनों में पाया गया है कि महिलाओं से जुड़े उत्पाद औसतन 7 से 13 प्रतिशत तक महंगे होते हैं। कुछ मामलों में यह अंतर 20 से 40 प्रतिशत तक पहुंच जाता है, और कभी-कभी आधी कीमत जितना भी। भारत में भले ही इस पर कोई आधिकारिक सरकारी रिपोर्ट न हो, लेकिन बाज़ार में तुलना करने पर यह फर्क साफ़ दिखता है।

सबसे ज़्यादा असर रोज़मर्रा के पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स में दिखाई देता है। रेज़र, डियोडरेंट, शैम्पू, हेयर रिमूवल क्रीम — इन सबमें महिलाओं के लिए बने विकल्प अक्सर छोटे पैक में और ज़्यादा कीमत पर मिलते हैं। यही नहीं, कपड़ों और जूतों में भी महिलाओं को अधिक कीमत चुकानी पड़ती है, जबकि कपड़ा, डिज़ाइन और निर्माण लागत लगभग समान होती है। यह फर्क बच्चों तक में दिखता है, जहां लड़कियों के कपड़े, लड़कों के मुकाबले महंगे होते हैं।

सेवाओं के क्षेत्र में यह असमानता और भी खुलकर सामने आती है। सैलून में एक साधारण हेयरकट के लिए महिलाओं से पुरुषों की तुलना में कहीं ज़्यादा शुल्क लिया जाता है। ड्राई क्लीनिंग, ब्यूटी ट्रीटमेंट और ग्रूमिंग सर्विसेज़ में भी यही स्थिति है। वजह अक्सर “ज़्यादा समय” या “ज़्यादा मेहनत” बताई जाती है, लेकिन हर केस में यह तर्क सही साबित नहीं होता।

स्वास्थ्य और स्वच्छता से जुड़े उत्पादों में पिंक टैक्स का असर सबसे संवेदनशील होता है। पीरियड्स से जुड़े उत्पाद किसी लग्ज़री नहीं बल्कि ज़रूरत हैं। भारत में लंबे विरोध और जागरूकता के बाद 2018 में सैनिटरी पैड से GST हटाया गया। यह एक बड़ा कदम था, लेकिन टैक्स हटने के बावजूद कई ब्रांड्स की कीमतें आज भी आम महिलाओं की पहुंच से बाहर बनी हुई हैं।

भारत में पिंक टैक्स को लेकर कोई विशेष कानून नहीं है। GST व्यवस्था में जेंडर के आधार पर कोई टैक्स नहीं लगाया जाता, फिर भी बाज़ार में कीमतों का अंतर मौजूद है। इसका मतलब साफ़ है — यह सरकार से ज़्यादा कंपनियों की प्राइसिंग और मार्केटिंग नीति का नतीजा है।

इसका सबसे बड़ा असर महिलाओं की आर्थिक ज़िंदगी पर पड़ता है। समान आय होने के बावजूद महिलाओं का कुल जीवनभर का खर्च ज़्यादा हो जाता है। खासकर मध्यम और निम्न आय वर्ग की महिलाओं के लिए यह बोझ और भारी हो जाता है। आर्थिक विशेषज्ञ इसे जेंडर आधारित आर्थिक भेदभाव मानते हैं, जो धीरे-धीरे लेकिन लगातार महिलाओं की बचत और आर्थिक स्वतंत्रता को प्रभावित करता है।

तो सवाल उठता है कि कंपनियां ऐसा क्यों करती हैं? वजह साफ़ है — यह मान लिया गया है कि महिलाएं पर्सनल केयर और दिखावे से जुड़े उत्पादों पर ज़्यादा खर्च करेंगी और कीमतों पर कम सवाल उठाएंगी। “स्पेशल” और “प्रीमियम” का टैग लगाकर कीमत बढ़ाना आसान हो जाता है।

कानूनी रूप से पिंक टैक्स गलत नहीं है, लेकिन सामाजिक और नैतिक रूप से यह असमानता को बढ़ावा देता है। इसी कारण दुनिया के कई देशों में अब जेंडर-न्यूट्रल प्राइसिंग की मांग ज़ोर पकड़ रही है।

भारत में सैनिटरी पैड से GST हटाना इस दिशा में एक सकारात्मक संकेत था, लेकिन असली बदलाव तब आएगा जब उपभोक्ता खुद सवाल पूछेंगे, कीमतों की तुलना करेंगे और कंपनियों से जवाबदेही मांगेंगे। जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक पिंक टैक्स बिना नाम के हमारी रोज़मर्रा की खरीदारी का हिस्सा बना रहेगा।

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