शबे बरात इस्लाम की उन मुक़द्दस रातों में से है जो इंसान को उसके रब से जोड़ती हैं…
उसे उसकी ग़लतियों का एहसास दिलाती हैं और मग़फिरत व रहमत की उम्मीद जगाती हैं…
यह रात शोर, हंगामे और दिखावे की नहीं बल्कि ख़ामोशी, तौबा और आत्ममंथन की रात है।
मुस्लिम समाज में शबे बरात की हैसियत सिर्फ़ एक तारीख़ या रस्म तक सीमित नहीं बल्कि यह रात हमें याद दिलाती है कि
हम पतंगे उड़ाने, सड़कों पर नारेबाज़ी करने या बे मक़सद तफरीह के लिए पैदा नहीं किए गए मुझे हैरत है कि अल्लाह ने जिस क़ौम को दुनिया में अमन क़ायम करने के लिए पैदा की उसकी शिनाख्त इसके उलट नज़र आ रही है हमारी पहचान इबादत, इल्म, अख़लाक़ और समाजी ज़िम्मेदारी से है इस मुक़द्दस रात पर मोटरसाइकिलों से हुड़दंग, सड़कों पर शोर-शराबा और किसी भी तरह की बे अदबी से सख़्त परहेज़ करना चाहिए।

जहाँ शहर में दीन की बड़ी कॉन्फ़्रेंसें होती हैं वहाँ अदब और सुकून के साथ बैठें उलमा ए किराम की बातों को ध्यान से सुनें क्योंकि क़ौमों की तक़दीर, नारे से नहीं नसीहत से बदलती है मस्जिदों में बैठकर अल्लाह की इबादत करें सच्चे दिल और अक़ीदत से लबरेज़ होकर तौबा करें अपने गुनाहों पर शर्मिंदगी महसूस करें और आज की इस रात यह अहद (वादा) करें
कि हम अपनी ज़िंदगियों को बदलेंगे सबसे अहम बात यह है कि आज हम यह तय करें कि,
हम अपने बच्चों को पढ़ाएंगे
चाहे एक दिन पेट भर खाएँ
और दूसरे दिन सब्र से काम लें
क्योंकि जिस क़ौम को
अपने बच्चों की तालीम और तरबियत की फ़िक्र होती है,
वह क़ौम कभी कमज़ोर नहीं होती।
आज हमारी पस्ती,
हमारी बेबसी और हमारा पिछड़ापन इस्लाम दुश्मन ताकतों की साज़िश के साथ साथ हमारी जहालत और इल्म से दूरी का नतीजा है..
शबे बरात हमें यही पैग़ाम देती है कि अगर आज हम ने अपनी राह न बदली तो कल की शिकायतों का कोई मतलब नहीं रहेगा।
आइए, इस शबे बरात पर
रब के सामने झुकें अपने आप से लड़ें और एक बेहतर इंसान बेहतर मुसलमान और ज़िम्मेदार शहरी बनने का संकल्प लें…
और प्रशासन की गाइड लाइन का पूरा ख्याल रखें….
नूर अहमद अज़हरी
प्रदेश अध्यक्ष
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड
ऑफ़ इंडिया
