आज देखा जायेगा रमज़ान शरीफ का चांद अगर चांद नज़र आता है तब ईशा की नमाज़ के बाद होंगी मसाजिद में तरावीह और सुबह सादिक में सेहरी का एहतिमाम होगा..अगर आज चांद नज़र नहीं आता तब कल 19 फरवरी से तरावीह और 20 फरवरी 2026 को पहला रोज़ा होगा.…
आज जब हम दस साल पीछे मुड़कर देखते हैं तो रमज़ान 1437 हिजरी सन 2016 की तस्वीर सामने आती है जून की शदीद गर्मी, 15 से 16 घंटे के लंबे रोज़े, तपती दोपहरें और इम्तिहान से भरे दिन उस वक़्त सब्र की मिसालें कायम हुईं मसाजिद आबाद रहीं और इफ़्तार के दस्तरख़्वान इंसानियत की खुशबू से महकते रहे और अब 2026 का रमज़ान मौसम बदला हुआ है दिन छोटे हैं, रोज़े लगभग 13 घंटे के होंगे यानी उस मुद्दत में तक़रीबन 2 से 3 घंटे का फर्क आ चुका है मगर यह फर्क हमें एक बड़ी हक़ीक़त समझाता है रोज़े की असल क़ीमत घंटे की लंबाई में नहीं बल्कि नियत की गहराई में है…
दस साल में मौसम बदला, वक़्त बदला हालात बदले मगर रमज़ान की रूह नहीं बदली वह आज भी तक़वा, सब्र, इत्तिहाद और इंसानियत का पैग़ाम लेकर आता है 2016 में जिस रब ने तपिश में सब्र सिखाया वही रब रमज़ान 2026 में रहमत और आसानी के साथ हमें अपने अंदर की इस्लाह की दावत दे रहा है…
रमज़ान हमें यह याद दिलाता है कि ज़िंदगी के हालात कभी एक जैसे नहीं रहते कभी दिन लंबे होते हैं कभी छोटे कभी सख़्ती होती है कभी राहत मगर मोमिन हर हाल में अपने रब की इबादत और बंदों की ख़िदमत में कायम रहता है…
आज ज़रूरत इस बात की है कि हम रमज़ान को सिर्फ़ रोज़े की मुद्दत से न तौलें बल्कि इसे अपने अख़लाक़, अपने किरदार और अपने समाजी रवैये में तब्दीली का ज़रिया बनाएं। ग़रीबों का ख्याल, रिश्तों की इस्लाह, नफ़रतों का ख़ात्मा और मुल्क में अमन व भाईचारे का फ़ारोग यही रमज़ान का असल मक़सद है…
दस साल पहले की गर्मी ने हमें सब्र सिखाया था और आज की आसानी हमें शुक्र सिखा रही है
सब्र और शुक्र इन्हीं दो अल्फ़ाज़ में रमज़ान की पूरी तालीम समाई हुई है…
अल्लाह रब्बुल आलमीन हमें इस मुबारक महीने की क़दर करने उसकी रूह को समझने और अपनी ज़िंदगी में हक़ीक़ी तब्दीली लाने की तौफ़ीक़ अता फरमाए।
हाफ़िज़ नूर अहमद अज़हरी
प्रदेश अध्यक्ष
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ऑफ़ इंडिया
