जम्मू-कश्मीर के राजौरी ज़िले की पहाड़ियों से उठी एक खामोश कोशिश आज एक मजबूत संदेश बनकर सामने आ रही है। महज़ 16 साल की उम्र में जाहिद अली ने वो कर दिखाया, जिसे अक्सर संसाधनों की कमी का बहाना बनाकर टाल दिया जाता है। कबाड़ और बेकार पड़ी चीज़ों को जोड़कर उन्होंने एक चलने वाली मिनी खुदाई मशीन यानी (एक्स्कावेटर) और एक छोटा हाइडल प्रोजेक्ट तैयार किया है।
जहां कई जगहों पर सुविधाओं की कमी को रुकावट माना जाता है, वहीं जाहिद ने उसी कमी को अपनी ताकत बना दिया। बिना बड़े लैब, बिना महंगे उपकरण सिर्फ जज़्बा, समझ और मेहनत के दम पर उन्होंने ‘स्क्रैप टू पावर’ की सोच को ज़मीन पर उतार दिया।
यह सिर्फ एक मॉडल नहीं, बल्कि उस सोच का प्रतीक है जो बताती है कि हुनर किसी संसाधन का मोहताज नहीं होता। विशेषज्ञ भी मानते हैं कि ऐसे नवाचार पर्यावरण के लिए फायदेमंद होने के साथ-साथ आत्मनिर्भर भारत की दिशा में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
जाहिद अली की कहानी सिर्फ प्रेरणा नहीं देती, यह सवाल भी खड़ा करती है कि अगर एक किशोर सीमित साधनों में इतना कर सकता है, तो सही मार्गदर्शन और अवसर मिलने पर वह कितना आगे जा सकता है।
