केरल में स्टूडेंट्स इस्लामिक ऑर्गनाइजेशन ऑफ इंडिया यानी SIO के एक प्रशिक्षण शिविर ने नया राजनीतिक और वैचारिक विवाद खड़ा कर दिया है। जमात-ए-इस्लामी हिंद के छात्र संगठन के इस कार्यक्रम में लगाए गए कुछ पोस्टर अब राज्यभर में चर्चा का विषय बन गए हैं।
मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक, शिविर में अबुल आला मौदूदी, हमास के संस्थापक शेख अहमद यासीन और मुस्लिम ब्रदरहुड के संस्थापक हसन अल-बन्ना की तस्वीरें प्रदर्शित की गई थीं। इन नामों के सामने आने के बाद राजनीतिक इस्लाम, कैंपस में वैचारिक प्रभाव और केरल की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है।
आलोचकों का कहना है कि यह सिर्फ पोस्टरों का मामला नहीं है, बल्कि उन विचारों और संदेशों का भी सवाल है जिन्हें युवाओं के बीच पहुंचाने की कोशिश की जा रही है। SIO लंबे समय से शैक्षणिक परिसरों में सक्रिय रहकर अपनी विचारधारा को विस्तार देने का प्रयास कर रहा है।
मीडिया रिपोर्ट्स संगठन पर धार्मिक आधार पर अलगाववादी सोच को बढ़ावा देने के आरोप लगा रहे हैं और यह भी कह रहे है की अलग-अलग समय पर इस पर प्रतिबंध भी लगाया गया था।
इस विवाद ने पिछले वर्ष की उस घटना की भी याद दिला दी, जब जमात-ए-इस्लामी की युवा इकाई सॉलिडेरिटी ने मलप्पुरम स्थित करीप्पूर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का घेराव किया था। रिपोर्ट के अनुसार, उस प्रदर्शन के दौरान भी इन्हीं नेताओं की तस्वीरों वाले पोस्टर और तख्तियां दिखाई दी थीं।
इसके अलावा कांग्रेस नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) की सरकार और गठबंधन में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग की महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए जमात-ए-इस्लामी को अपनी गतिविधियों के विस्तार के लिए अनुकूल माहौल नजर आ रहा है। यही वजह है कि संगठन और उससे जुड़े विभिन्न मंच अब अधिक सक्रिय दिखाई दे रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों और आलोचकों का मानना है कि यह विवाद केवल एक प्रशिक्षण शिविर तक सीमित नहीं है। उनके मुताबिक, यह केरल की राजनीति में बढ़ती वैचारिक प्रतिस्पर्धा और धार्मिक संगठनों के प्रभाव को लेकर उठ रहे बड़े सवालों का हिस्सा है। उनका कहना है कि राज्य में चाहे UDF सत्ता में हो या CPM के नेतृत्व वाला LDF, दोनों पर समय-समय पर इस्लामी संगठनों को तुष्ट करने के आरोप लगते रहे हैं।
सीधी बात यह है की SIO के इस प्रशिक्षण शिविर में लगे पोस्टरों ने एक बार फिर केरल की राजनीति, छात्र संगठनों की भूमिका और राजनीतिक इस्लाम को लेकर बहस को केंद्र में ला दिया है।
