करघे पर बुनी मेहनत ने दिलाया देश का सबसे बड़ा सम्मान, शाह मोहम्मद अंसारी ने दुनिया तक पहुंचाई बनारस की पहचान

जिस करघे की आवाज में एक परिवार की पीढ़ियां पली-बढ़ीं, उसी करघे ने शाह मोहम्मद अंसारी को देश के राष्ट्रीय मंच तक पहुंचा दिया।

वाराणसी की गलियों में आज भी कई घर ऐसे हैं, जहां सुबह की शुरुआत मशीनों के शोर से नहीं, बल्कि करघे की आवाज से होती है। धागों को जोड़ते-जोड़ते यहां के कारीगर सिर्फ साड़ियां नहीं बनाते, बल्कि सदियों पुरानी भारतीय विरासत को जिंदा रखते हैं। इन्हीं कारीगरों में एक नाम है शाह मोहम्मद अंसारी, जिन्होंने अपने पारंपरिक हुनर को अपनी पहचान बनाया और अब इसी हुनर के दम पर देशभर में सम्मान हासिल किया है।

वाराणसी के चोलापुर के रहने वाले शाह मोहम्मद अंसारी को 7 अगस्त 2026 को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के मौके पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने ‘संत कबीर हैंडलूम अवॉर्ड’ से सम्मानित किया। उन्हें यह सम्मान ऐसी पारंपरिक बुनाई को बचाने के लिए दिया गया, जिसके सामने आज मशीनों और बड़े पैमाने पर होने वाले उत्पादन की वजह से खत्म होने का खतरा है।

एक हुनर, जिसे छोड़ना नहीं चुना

शाह मोहम्मद अंसारी की कहानी सिर्फ एक पुरस्कार जीतने की कहानी नहीं है। यह उस इंसान की कहानी है जिसने बदलते वक्त के बीच अपने पुश्तैनी हुनर का साथ नहीं छोड़ा। बनारसी बुनाई आसान काम नहीं है। एक खूबसूरत बनारसी साड़ी के पीछे घंटों नहीं, बल्कि कई दिनों की मेहनत, धैर्य और बारीकी छिपी होती है। रेशम के धागों के साथ जरी, फूल-पत्तियों की डिजाइन और महीन काम को करघे पर उतारने के लिए कारीगर को वर्षों का अनुभव चाहिए। इसके अलावा अंसारी ने इसी हुनर को अपनी ताकत बनाया। उन्होंने पारंपरिक तकनीकों को संभालने के साथ-साथ नई पीढ़ी को भी इस कला से जोड़ने की कोशिश की।

बनारस की पहचान के पीछे बुनकरों के हाथ

जब भी बनारसी साड़ी का नाम आता है, तो हमारे सामने खूबसूरत रंग, रेशम और जरी की तस्वीर उभरती है। लेकिन इस खूबसूरती के पीछे उन बुनकरों के हाथ होते हैं, जो पीढ़ियों से इस कला को आगे बढ़ाते आए हैं। लेकिन क्या आपको पता है बनारस के मुस्लिम बुनकर परिवारों का इस परंपरा में खास योगदान रहा है। जुलाहा और अंसारी परिवारों में यह हुनर अक्सर पिता से बेटे और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचता रहा है।

यही वजह है कि बनारसी साड़ी सिर्फ एक कपड़ा नहीं है। यह भारत की साझा संस्कृति की एक खूबसूरत मिसाल है। एक तरफ इसमें भारत की कला और परंपराओं से जुड़े डिजाइन दिखाई देते हैं, तो दूसरी तरफ इसे तैयार करने में मुस्लिम बुनकर परिवारों की पीढ़ियों की मेहनत शामिल होती है। यही मेल बनारस की संस्कृति को खास बनाता है।

जब बनारसी साड़ी विदेश पहुंचती है, साथ जाती है भारत की कहानी

आज बनारसी साड़ी की पहचान सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। जब यह साड़ी दुनिया के अलग-अलग देशों तक पहुंचती है, तो उसके साथ भारत की कला, संस्कृति और कारीगरों की मेहनत भी पहुंचती है। यही वजह है कि हथकरघा को केवल रोजगार का साधन मानना काफी नहीं है। यह भारत की सांस्कृतिक पहचान को दुनिया तक पहुंचाने का जरिया भी है। इसलिए शाह मोहम्मद अंसारी की उपलब्धि इसी बात को साबित करती है कि अगर पारंपरिक हुनर को सही सम्मान और सही अवसर मिले, तो एक स्थानीय कारीगर भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान बना सकता है।

युवाओं के लिए सबसे बड़ा सवाल

लेकिन इस सफलता के साथ एक बड़ा सवाल भी जुड़ा है—क्या आने वाली पीढ़ी इस हुनर को अपनाएगी?

आज मशीनों से कम समय में बड़ी मात्रा में कपड़े तैयार हो जाते हैं। ऐसे में हाथ से होने वाली बुनाई को बचाए रखना आसान नहीं है। इसलिए जरूरत सिर्फ बुनकरों को सम्मान देने की नहीं, बल्कि उनके हुनर को ऐसा भविष्य देने की है, जिसमें उन्हें अच्छी कमाई, बेहतर बाजार और सम्मान मिल सके। और युवाओं को पारंपरिक बुनाई के साथ नई डिजाइन, तकनीक, डिजिटल मार्केटिंग और ऑनलाइन बाजार से जोड़ना समय की जरूरत है।

शाह मोहम्मद अंसारी की सफलता का असली मतलब

शाह मोहम्मद अंसारी का सम्मान इसलिए खास है क्योंकि यह सिर्फ एक कारीगर को मिला पुरस्कार नहीं है। यह उन तमाम बुनकरों के लिए उम्मीद है, जो आज भी अपने हाथों से भारत की पहचान तैयार कर रहे हैं। चोलापुर के एक करघे से शुरू हुई यह कहानी राष्ट्रपति भवन तक पहुंची है। यह कहानी बताती है कि पुराना हुनर अगर मेहनत, नए विचार और सही अवसर के साथ आगे बढ़े, तो वह कभी पुराना नहीं होता।

शाह मोहम्मद अंसारी ने धागों से सिर्फ बनारसी कपड़ा नहीं बुना—उन्होंने अपनी मेहनत से विरासत, पहचान और भविष्य को एक साथ जोड़ दिया। और शायद यही इस कहानी की सबसे खूबसूरत बात है— करघा आज भी वहीं है, लेकिन उसकी आवाज अब बनारस की गलियों से निकलकर देश के बड़े मंच तक पहुंच चुकी है।

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