1933 में जिन्ना ने जिसे कहा था ‘नामुमकिन सपना’, 14 साल बाद उसी पाकिस्तान के लिए क्यों बन गए सबसे बड़ा चेहरा?

नई दिल्ली: इतिहास में कुछ तारीखें सिर्फ कैलेंडर का हिस्सा नहीं होतीं, बल्कि आने वाले बड़े बदलावों की शुरुआत करती हैं। 28 जनवरी 1933 भी ऐसी ही एक तारीख थी। इसी दिन कैंब्रिज में पढ़ रहे चौधरी रहमत अली ने एक अलग मुस्लिम राष्ट्र का विचार सामने रखा और उसके लिए एक नाम भी दिया—‘पाकिस्तान’।

लेकिन इस कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा यह नहीं है कि पाकिस्तान का नाम पहली बार कब सामने आया। असली सवाल यह है कि जिस विचार को मोहम्मद अली जिन्ना ने उस समय ‘नामुमकिन सपना’ कहकर खारिज कर दिया था, आखिर वही विचार कुछ साल बाद उनकी राजनीति का केंद्र कैसे बन गया?

कहानी शुरू होती है कैंब्रिज के एक छोटे से कमरे से

साल 1933। कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में वकालत की पढ़ाई कर रहे चौधरी रहमत अली ने भारत के भविष्य को लेकर अपना विचार एक साढ़े चार पन्नों के पैंफलेट में लिखा।

  • उस पैंफलेट पर तारीख थी—28 जनवरी 1933।
  • रहमत अली का विचार साफ था। भारत के उत्तर-पश्चिमी उन इलाकों को, जहां मुसलमानों की आबादी अधिक थी, अलग करके एक नया देश बनाया जाए।
  • इस नए देश का नाम भी उन्होंने ही सुझाया—पाकिस्तान
  • रहमत अली के मुताबिक, ‘P’ से पंजाब, ‘A’ से अफगानिस्तान, ‘K’ से कश्मीर, ‘S’ से सिंध और ‘Tan’ से बलूचिस्तान लिया गया था।

यानी ‘पाकिस्तान’ नाम सिर्फ एक शब्द नहीं था, बल्कि एक प्रस्तावित भूगोल और राजनीतिक विचार का नाम था।

रहमत अली की नजर जिन्ना पर थी

रहमत अली जानते थे कि उनके विचार को राजनीतिक ताकत देने के लिए एक बड़े मुस्लिम नेता की जरूरत थी। उस समय मोहम्मद अली जिन्ना मुस्लिम राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान बना चुके थे। रहमत अली ने जिन्ना को अपना प्रस्ताव समझाने के लिए लंदन के वाल्डोर्फ होटल में डिनर पार्टी रखी।

उन्हें उम्मीद थी कि जिन्ना उनके विचार को आगे ले जाएंगे। लेकिन जिन्ना ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने पाकिस्तान के प्रस्ताव को स्वीकार करने के बजाय उसे ‘नामुमकिन सपना’ कहकर खारिज कर दिया।

अब सवाल उठता है की उस समय जिन्ना पाकिस्तान के पक्ष में क्यों नहीं थे?

इसके लिए जिन्ना की उस समय की राजनीति को समझना जरूरी है।

दरअसल 1933 में जिन्ना भारत को बांटकर अलग देश बनाने की मांग नहीं कर रहे थे। वह भारत के भीतर ही मुस्लिमों के राजनीतिक अधिकारों के लिए लड़ रहे थे और हिंदू-मुस्लिम एकता के हिमायती थे। इसी वजह से रहमत अली का अलग मुस्लिम राष्ट्र का प्रस्ताव उन्हें सही रास्ता नहीं लगा। यानी जिस पाकिस्तान को बाद में जिन्ना की राजनीति से जोड़कर देखा गया, उसके शुरुआती प्रस्ताव से जिन्ना खुद सहमत नहीं थे।

लेकिन राजनीतिक हालात तेजी से बदलने लगे

1930 के दशक में हिंदू-मुस्लिम राजनीतिक रिश्तों को लेकर बहस लगातार बढ़ रही थी। 1930 के मुस्लिम लीग अधिवेशन में कवि मुहम्मद इकबाल ने ‘टू-नेशन थ्योरी’ का जिक्र किया था और कहा था कि इसे स्वीकार करने से भारत की सांप्रदायिक समस्या का स्थायी समाधान निकाला जा सकता है।

इसके बाद आया 1937 का चुनाव, जिसने जिन्ना की राजनीति को एक अहम मोड़ दिया।

दिए गए विवरण के मुताबिक, कांग्रेस ने उन राज्यों में जिन्ना और मुस्लिम लीग का सहयोग लेने से इनकार किया, जहां मुसलमान अल्पसंख्यक थे। जिन्ना के लिए यह सिर्फ सीटों या गठबंधन की राजनीति का सवाल नहीं था। इसे उन्होंने इस बात के संकेत के तौर पर देखा कि कांग्रेस के भारत में मुस्लिम लीग के साथ न्याय नहीं होगा।

यहीं से जिन्ना की सोच में बड़ा बदलाव दिखाई देने लगा।

‘नामुमकिन सपना’ धीरे-धीरे राजनीतिक मांग बन गया, 1933 में जिन्ना जिस पाकिस्तान के विचार से सहमत नहीं थे, कुछ वर्षों बाद वही विचार उनकी राजनीति का सबसे अहम मुद्दा बन गया।

जिन्ना अलग मुस्लिम राष्ट्र की मांग पर अड़ गए। यह मांग धीरे-धीरे मुस्लिम लीग की राजनीति का केंद्रीय हिस्सा बन गई और आखिरकार 1947 में भारत के विभाजन के साथ पाकिस्तान अस्तित्व में आया।

इस तरह 28 जनवरी 1933 से 1947 तक का सफर सिर्फ एक नाम के सामने आने की कहानी नहीं है। यह उस राजनीतिक बदलाव की कहानी है, जिसमें एक ऐसा विचार, जिसे शुरुआत में जिन्ना ने असंभव बताया था, बाद में उनकी राजनीति की सबसे बड़ी मांग बन गया।

और इतिहास का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है, पाकिस्तान का प्रस्ताव सबसे पहले रहमत अली ने रखा, जिन्ना ने उसे ठुकराया, लेकिन कुछ वर्षों बाद उसी पाकिस्तान के निर्माण के सबसे बड़े राजनीतिक चेहरों में जिन्ना शामिल हो गए।

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