मीरवाइज–पेजेशकियान मुलाकात: धार्मिक संवाद या कश्मीर पर ईरान की नई कूटनीति?

नई दिल्ली: भारत की राजधानी में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के बीच ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान की कश्मीर के मीरवाइज उमर फारूक से मुलाकात ने सियासी और कूटनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी है। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि दोनों नेताओं ने मुलाकात की, बल्कि सवाल यह है कि इस मुलाकात का संदेश क्या है? मीरवाइज उमर फारूक को भारत में ईरान के राजदूत डॉ. मोहम्मद फथाली की ओर से आयोजित एक विशेष संवाद कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया था। इस कार्यक्रम में धार्मिक नेताओं, बुद्धिजीवियों और अन्य प्रमुख हस्तियों को बुलाया गया था और इसके बाद रात्रिभोज भी आयोजित किया गया। यानी उपलब्ध जानकारी के आधार पर इसे सीधे तौर पर कश्मीर पर किसी औपचारिक द्विपक्षीय वार्ता के रूप में देखना सही नहीं होगा। लेकिन मीरवाइज की शख्सियत और ईरान-कश्मीर के पुराने सांस्कृतिक रिश्तों को देखते हुए इस मुलाकात की अपनी एक खास अहमियत जरूर है।

मीरवाइज ही क्यों?

मीरवाइज उमर फारूक सिर्फ कश्मीर के एक धार्मिक नेता नहीं हैं। वे श्रीनगर की जामा मस्जिद से जुड़े कश्मीर के प्रमुख धार्मिक चेहरों में शामिल हैं और हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नेतृत्व से भी उनका पुराना राजनीतिक जुड़ाव रहा है। यही वजह है कि ईरानी दूतावास की ओर से आयोजित कार्यक्रम में उनकी मौजूदगी को केवल सामान्य सामाजिक मुलाकात कहकर नजरअंदाज करना भी आसान नहीं है। मीरवाइज और ईरानी प्रतिनिधियों के बीच संपर्क नया नहीं है। इस वर्ष मार्च में मीरवाइज ने कश्मीरी धार्मिक नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल के साथ नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास जाकर ईरान के तत्कालीन सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत पर संवेदना व्यक्त की थी। उस दौरान मीरवाइज ने कश्मीर और ईरान के बीच पुराने सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और धार्मिक रिश्तों का उल्लेख करते हुए कश्मीर को लंबे समय से “ईरान-ए-सगीर” यानी छोटा ईरान कहे जाने की बात भी कही थी। यानी पेजेशकियान और मीरवाइज की मुलाकात के पीछे एक पुराना सामाजिक-सांस्कृतिक संपर्क भी मौजूद है।

क्या यह कश्मीर डिप्लोमेसी है?
यहीं सबसे बड़ा सवाल है। भारत का आधिकारिक रुख साफ है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है और भारत कश्मीर से जुड़े मुद्दों को अपनी संप्रभुता तथा भारत-पाकिस्तान के द्विपक्षीय संदर्भ में देखता है। दूसरी तरफ ईरान के शीर्ष नेतृत्व ने अतीत में कश्मीर में मुसलमानों की स्थिति पर सार्वजनिक टिप्पणी की है। 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के विशेष प्रावधान हटाए जाने के बाद तत्कालीन सर्वोच्च नेता अली खामेनेई ने कश्मीर के मुसलमानों की स्थिति को लेकर चिंता व्यक्त की थी, जिस पर भारत ने कड़ी प्रतिक्रिया दी थी। इस इतिहास को देखते हुए मीरवाइज के साथ ईरानी राष्ट्रपति की मुलाकात स्वाभाविक रूप से सवाल पैदा करती है। लेकिन यहां सियासी विश्लेषण और तथ्य के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है। अभी तक ऐसा कोई स्पष्ट संकेत सामने नहीं आया है कि पेजेशकियान ने मीरवाइज के साथ किसी औपचारिक कश्मीर नीति पर बातचीत की हो या ईरान ने कश्मीर को लेकर अपनी नीति में कोई नया बदलाव घोषित किया हो। इसलिए इसे “ईरान की नई कश्मीर नीति” कहना अभी जल्दबाजी होगी। हां, इसे ईरान की धार्मिक और सामाजिक पहुंच तथा प्रतीकात्मक कूटनीति के हिस्से के रूप में जरूर देखा जा सकता है।

भारत के लिए ईरान कितना अहम है?
इस पूरी कहानी का दूसरा पहलू भारत और ईरान के रिश्ते हैं। और यही इस मुलाकात को और दिलचस्प बनाता है। पेजेशकियान के भारत दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी अहम बातचीत हुई। दोनों नेताओं ने पश्चिम एशिया की स्थिति, समुद्री सुरक्षा और व्यापारिक आवाजाही जैसे मुद्दों पर चर्चा की। भारत ने खास तौर पर स्वतंत्र समुद्री आवाजाही और व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा पर जोर दिया। भारत और ईरान के बीच रिश्ते केवल धार्मिक या राजनीतिक संपर्क तक सीमित नहीं हैं। चाबहार बंदरगाह, मध्य एशिया तक पहुंच, व्यापार, ऊर्जा और क्षेत्रीय संपर्क—ये सभी दोनों देशों के रणनीतिक रिश्तों का हिस्सा हैं। हालिया बातचीत में भी चाबहार को महत्वपूर्ण विषय माना जा रहा है। ईरान ने भी हाल के दिनों में भारत के साथ अपने रिश्तों को “बहुत अच्छे”, ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण बताया है। इसलिए तेहरान के लिए दिल्ली के साथ मजबूत संबंध बनाए रखना एक बड़ा रणनीतिक हित है।

तो फिर कश्मीर का सवाल कहां आता है?
यही इस पूरे मामले की सबसे दिलचस्प परत है। ईरान एक तरफ भारत के साथ अपने रणनीतिक और आर्थिक रिश्तों को आगे बढ़ाना चाहता है। दूसरी तरफ वह मुस्लिम दुनिया के मुद्दों पर अपनी वैचारिक पहचान भी बनाए रखना चाहता है। फिलिस्तीन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। ईरान लंबे समय से फिलिस्तीन को अपनी विदेश नीति के प्रमुख मुद्दों में रखता आया है। कश्मीर भी मुस्लिम दुनिया में भावनात्मक और राजनीतिक संवेदनशीलता वाला विषय है। लेकिन दोनों मुद्दों को एक जैसा मानना सही नहीं होगा। फिलिस्तीन और कश्मीर का इतिहास, अंतरराष्ट्रीय संदर्भ और राजनीतिक स्थिति अलग-अलग है। इसलिए ईरान अगर कश्मीर के धार्मिक या सामाजिक नेतृत्व से संपर्क करता है तो इसका मतलब यह जरूरी नहीं कि वह भारत के खिलाफ कोई नया मोर्चा खोल रहा है। बल्कि यह संभव है कि तेहरान दिल्ली के साथ रणनीतिक रिश्ते बनाए रखते हुए मुस्लिम समाज के साथ अपना संवाद भी कायम रखना चाहता हो।

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