(डॉ शुजाअत अली क़ादरी)
जब भी दुनिया में कहीं मुसलमानों के अधिकारों, धार्मिक स्वतंत्रता या मानवीय संकट का प्रश्न उठता है, तो इस्लामी दुनिया की आवाज़ अक्सर एकजुटता के दावे के साथ सामने आती है। लेकिन उइगर मुसलमानों के मामले में यह एकजुटता आश्चर्यजनक रूप से मौन दिखाई देती है।
चीन के शिनजियांग क्षेत्र में वर्षों से धार्मिक निगरानी, सांस्कृतिक नियंत्रण, मस्जिदों पर प्रतिबंध, भाषा पर दबाव और सामाजिक पुनर्गठन जैसी रिपोर्टें सामने आती रही हैं, फिर भी अधिकांश मुस्लिम देशों की ओर से केवल सीमित या प्रतीकात्मक प्रतिक्रिया ही दिखाई दी है।
ह्यूमन राइट्स वॉच की ताज़ा रिपोर्ट, जिसमें चीन के प्रस्तावित “जातीय एकता और प्रगति कानून” को लेकर चेतावनी दी गई है, इस चिंता को और गंभीर बनाती है। यदि यह कानून लागू होता है, तो उइगर मुसलमानों की भाषा, धार्मिक पहचान और सांस्कृतिक परंपराओं पर राज्य का नियंत्रण और अधिक संस्थागत रूप ले सकता है।
लेकिन इस पूरे मुद्दे पर इस्लामी दुनिया की प्रमुख राजनीतिक आवाज़ें लगभग अनुपस्थित हैं। यह चुप्पी केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि नैतिक प्रश्न भी बन चुकी है।
विश्लेषकों का मानना है कि इस मौन के पीछे सबसे बड़ा कारण आर्थिक और रणनीतिक निर्भरता है। चीन आज कई मुस्लिम देशों का प्रमुख व्यापारिक साझेदार, निवेशक और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं का वित्तीय सहयोगी है। ऐसे में कई सरकारें सार्वजनिक आलोचना से बचती हैं।
लेकिन यही स्थिति एक बड़े विरोधाभास को जन्म देती है जहाँ एक ओर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उम्मत की एकता की बात होती है, वहीं दूसरी ओर जब एक मुस्लिम समुदाय अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान के दबाव की बात करता है, तो राजनीतिक प्रतिक्रिया बहुत सीमित रह जाती है।
यह भी महत्वपूर्ण है कि उइगर प्रश्न अब केवल धार्मिक अधिकारों का मामला नहीं बल्कि सांस्कृतिक अस्तित्व और नागरिक गरिमा का प्रश्न बन चुका है। यदि भाषा, परंपरा, धार्मिक अभ्यास और सामाजिक स्मृति पर निरंतर नियंत्रण बढ़ता है, तो इसका प्रभाव आने वाली पीढ़ियों तक जाता है। ऐसे में इस्लामी दुनिया की चुप्पी केवल एक राजनीतिक रणनीति नहीं, बल्कि इतिहास के सामने एक कठिन नैतिक स्थिति बन जाती है।
आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है:
क्या आर्थिक हित इतने प्रभावी हो चुके हैं कि सांस्कृतिक और धार्मिक अधिकारों पर उठने वाली आवाज़ें भी सीमित हो जाएँ?
और यदि इस्लामी दुनिया इस प्रश्न पर स्पष्ट नैतिक स्वर नहीं अपनाती, तो उइगर मुसलमानों का मुद्दा आने वाले समय में केवल चीन की नीति का नहीं, बल्कि वैश्विक मुस्लिम नेतृत्व की विश्वसनीयता का भी विषय बन जाएगा।
(लेखक, मुस्लिम यूथ ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इंडिया के कंविनर हैं)
