अल-अक्सा पर बढ़ता दबाव: क्या यह सिर्फ़ “सुरक्षा” है या एक सोची-समझी रणनीति?

अधिकृत यरुशलम से आई रिपोर्ट एक ऐसा सवाल खड़ा करती है, जिसे अब नज़रअंदाज़ करना मुश्किल होता जा रहा है! क्या अल-अक्सा मस्जिद के साथ हो रहा सब कुछ महज़ सुरक्षा का मामला है, या इसके पीछे कोई गहरी और लंबी योजना काम कर रही है?

अल-क़ुद्स फ़ाउंडेशन ने जिस तरह से हालात का ब्योरा दिया है, वह चौंकाने वाला भी है और सोचने पर मजबूर करने वाला भी। 40 दिनों तक मस्जिद को बंद रखा गया, वो भी ऐसे समय में जब रमज़ान चल रहा था और ईद-उल-फ़ित्र जैसा अहम मौका भी उसी दौरान आया। सवाल ये है कि क्या “सुरक्षा” के नाम पर इबादत के हर दरवाज़े को बंद कर देना ही एकमात्र रास्ता था?

फिर मस्जिद को खोला जाता है, लेकिन कुछ ही देर में नमाज़ियों को हटाकर जगह खाली करवाई जाती है! किसके लिए? रिपोर्ट के मुताबिक़, सैकड़ों सेटलर्स के लिए, जो समूहों में आते हैं, गाते हैं, नाचते हैं, सींग बजाते हैं और “एपिक प्रोस्टेशन” जैसी गतिविधियाँ करते हैं। क्या यह वही जगह नहीं है जिसे दुनिया भर के मुसलमान एक पवित्र इबादतगाह मानते हैं?

और सबसे अहम बात – मस्जिद को खोलने और बंद करने का अधिकार किसके पास है? इस्लामिक वक़्फ़, जो परंपरागत रूप से इसकी देखरेख करता रहा है, या फिर इसरायली पुलिस? अगर फैसले कहीं और से लिए जा रहे हैं, तो क्या यह धीरे-धीरे नियंत्रण बदलने की प्रक्रिया नहीं है?

अल-क़ुद्स फ़ाउंडेशन का दावा है कि यह सब एक बड़े प्लान का हिस्सा है! पहले अधिकार कमज़ोर करो, फिर प्रशासनिक नियंत्रण लो, और आख़िर में पहचान बदल दो। अगर ऐसा है, तो यह सिर्फ़ एक स्थानीय मसला नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत का सवाल बन जाता है।

फ़ाउंडेशन ने साफ़ कहा है कि यह मामला अब किसी एक पक्ष के बस का नहीं रहा। उन्होंने अरब और इस्लामी दुनिया से एकजुट होकर कदम उठाने की अपील की है। साथ ही, जॉर्डन को भी याद दिलाया गया है कि उसकी ऐतिहासिक भूमिका अब सिर्फ़ काग़ज़ों तक सीमित होती जा रही है।

सबसे अहम बात जो सामने आती है, वो यह कि ज़मीन पर मौजूदगी ही असली ताक़त है। फ़िलिस्तीनियों से कहा गया है कि वे मस्जिद में अपनी मौजूदगी बनाए रखें, क्योंकि जब फैसले दूर से लिए जाएँ और हक़ धीरे-धीरे छीना जाए, तब खामोश रहना सबसे बड़ा नुकसान साबित हो सकता है।

अब सवाल सिर्फ़ यह नहीं है कि अल-अक्सा में क्या हो रहा है सवाल यह है कि दुनिया इसे कैसे देख रही है, और कब तक सिर्फ़ देखती रहेगी।

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