संघ, संविधान और रजिस्ट्रेशन: प्रियंक खरगे ने क्यों छेड़ी 100 साल पुरानी बहस?

By : Shakeel Akhtar

कर्नाटक के गृहमंत्री प्रियांक खरगे ने जो मुद्दे उठाए हैं ठीक वही गांधी जी की हत्या के बाद उस समय के देश के गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने उठाए थे।

सरदार पटेल के बाद राहुल गांधी और अब प्रियांक खरगे ने आरएसएस पर जो सवाल उठाए हैं संघ उनसे हमेशा बचने की कोशिश करता है।

और कांग्रेस भी अपने उन सवालों को लगातार नहीं उठाती रहती जैसे संघ और भाजपा उसके खिलाफ लगातार चाहे सत्ता में हो या विपक्ष में उठाते रहते हैं। 12 साल से सत्ता में हैं मगर अपनी और अपने काम के बारे में कोई बात नहीं करके नेहरू और गांधी को ही हमेशा सवालों के घेरे में लाते रहते हैं।

खैर प्रियांक खरगे के कि संघ रजिस्ट्रेशन क्यों नहीं करवाता के जवाब में संघ प्रमुख‌ भागवत का यह कहना कि आज तक 100 साल में यह किसी ने नहीं पूछा पूरी तरह गलत है।

नेहरू को छोटा दिखाने के लिए जिन सरदार पटेल की वे सबसे ज्यादा चर्चा करते हैं उन्हीं ने उस समय के सरसंघचालक गोलवलकर से यह सवाल भी पूछा था। उन पर गांधी की हत्या का आरोप भी लगाया था। और मिठाई बांटने एवं खुशी प्रकट करने की बात भी कही थी‌।

मोहन भागवत ने यह तो स्वीकार कर लिया कि उनका संविधान है। ‌75 साल में पहली बार है जब संघ ने इसे स्वीकार किया हो। ‌
यह प्रियांक खरगे की पहली जीत है। उस समय भी उनका वही तर्क होता था जो आज भागवत ने दिया है कि हिंदू धर्म का कोई रजिस्ट्रेशन नहीं है इसलिए संघ का क्यों? उस समय कहा गया था कि हिंदू संयुक्त परिवार का भी क्या कोई संविधान होता है? यह तो एक अलिखित सदियों की परंपराओं से स्वत: निर्मित संविधान है।

लेकिन सरदार पटेल ने इस तर्क स्वीकार नहीं किया था उनका कहना था की सबसे महान हिंदू तो गांधी थे।

जो भागवत ने माना है कि संविधान है वह संघ पर 4 फरवरी 1948 को लगाएं प्रतिबंध को खत्म करवाने के लिए बनाया गया था और गृह मंत्रालय को दिया गया था। लेकिन माना कितना गया यह एक उदाहरण से समझ सकते हैं कि उसमें लिखा था की सभी धर्म के प्रति समान आदर। जो माना कभी नहीं गया।

प्रियांक खरगे ने जो भारत की एकता और अखंडता के लिए जरूरी मुद्दे उठाए हैं उसमें उन्हें राहुल गांधी के अलावा और कितने कांग्रेसियों का साथ मिलेगा कहना मुश्किल है। जो नेहरू कहते थे संघ के कई मुंह हैं कई रूप हैं उनसे मुकाबला करने के लिए कांग्रेस को किसी न किसी दिन तो खुले रूप से सामने आना पड़ेगा। जितनी देर करेंगे उतनी ही वह मजबूत और कांग्रेस कमजोर होती चली जाएगी।

छात्रों की युवाओं की अमेरिका की दादागिरी की महंगाई सरकारी शिक्षा चिकित्सा खत्म करना यह सब समस्या इस विचार में छुपी हुई है जो देश को पीछे की तरफ ले जाना चाहता है। मनुवाद की तरफ। जहां सबके लिए सब कुछ नहीं होगा। केवल कुछ लोगों के लिए होगा। दरअसल मुस्लिम तो एक बहाना है दलित पिछड़ा असली निशाना है। ‌

इसलिए जिस 100 साल की बात मोहन भागवत कर रहे हैं उसमें इनमें से किसी एक को भी कभी संघ में सर्वोच्च स्थान नहीं मिला। इसीलिए आरक्षण पर सवाल उठाते हैं जाति गणना का विरोध करते हैं। समानता की नहीं समरसता की बात करते हैं जिस दलित पिछड़ा विरोधी शब्द को दूसरे भी बिना पूरा अर्थ जाने उपयोग करने लगते हैं।

समरसता मतलब हमारे रस में डूब जाना। समरसता का मतलब कहीं से भी समान अधिकार नहीं होता है। यह वनवासी तुष्टिकरण छद्म धर्मनिरपेक्षता की तरह संघ का गढ़ा हुआ शब्द है।

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