By : त्रिभुवन
प्रख्यात पत्रकार तवलीन सिंह का यह ट्वीट भाषायी चिंता नहीं, राजनीतिक पाखंड की एक बहुत महीन मिसाल है।
राहुल गांधी कोटा में छात्रों से परीक्षा-व्यवस्था की तबाही, पेपर लीक, कोचिंग के आर्थिक शोषण, बेरोज़गारी, पारिवारिक दबाव और विद्यार्थियों की मानसिक यातना पर बात कर रहे थे।
उन्होंने उस व्यवस्था को चुनौती दी, जिसमें करोड़ों बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस और कुछ गिनी-चुनी परीक्षाओं की सुरंग में धकेलकर बाकी प्रतिभाओं को लगभग विफल घोषित कर दिया जाता है।
लेकिन तवलीन सिंह को इस पूरी बातचीत में समस्या यह दिखाई दी कि राहुल अंग्रेज़ी में क्यों बोले!
यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी जलते हुए घर के सामने खड़े होकर पूछा जाए कि आग बुझाने वाला आदमी बाल्टी पर हिन्दी में क्यों नहीं लिखकर लाया।
पहली बात, भारत के विद्यार्थी इतने असहाय नहीं हैं कि अंगरेज़ी का एक सामान्य संवाद समझ ही न सकें। कोटा में देश के लगभग हर प्रदेश से आए विद्यार्थी पढ़ते हैं। वहाँ हिन्दी, अंगरेज़ी और अनेक भारतीय भाषाओं का सहज मिश्रण है। अंगरेज़ी में कही गई बात अपने आप जनता-विरोधी नहीं हो जाती और हिन्दी में कही गई हर बात अपने आप जनपक्षधर नहीं बन जाती।
दूसरी बात, तवलीन सिंह स्वयं मुख्यतः अंगरेज़ी में लिखती हैं, अंगरेज़ी मीडिया के मंचों पर बोलती हैं और भारतीय राजनीति पर अपनी राय अंगरेज़ी में व्यक्त करती हैं। तब भाषा लोकतांत्रिक संप्रेषण का माध्यम होती है; लेकिन राहुल गांधी अंगरेज़ी बोल दें तो अचानक हिन्दी की आत्मा संकट में पड़ जाती है। यही चयनात्मक भाषायी राष्ट्रवाद है।
तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात—यदि राहुल केवल हिन्दी बोलते तो यही लोग शायद पूछते कि दक्षिण और पूर्वोत्तर भारत के विद्यार्थियों से संवाद किस भाषा में होगा। वे अंगरेज़ी बोलते हैं तो पूछा जाता है कि हिन्दी क्यों नहीं। अर्थात आपत्ति भाषा से नहीं, वक्ता से है। निष्कर्ष पहले तय है, तर्क बाद में खोजा जाता है।
किसी पत्रकार का काम यह पूछना होना चाहिए था कि राहुल गांधी ने परीक्षा-व्यवस्था को “एक्सटॉर्शन मशीन” क्यों कहा; क्या कोचिंग उद्योग वास्तव में परिवारों को कर्ज़ में धकेल रहा है; पेपर लीक की जवाबदेही किसकी है; और विद्यार्थियों की आत्महत्याओं को रोकने के लिए क्या संरचनात्मक बदलाव चाहिए।
परन्तु जब सत्ता से कठिन सवाल पूछने की इच्छा क्षीण हो जाए, तब विपक्षी नेता के वाक्य की भाषा ही सबसे बड़ा राष्ट्रीय प्रश्न बना दी जाती है। तवलीन सिंह का ट्वीट दरअसल यह नहीं पूछ रहा कि राहुल ने अंगरेज़ी क्यों बोली। वह शिक्षा-संकट पर उठी असुविधाजनक बहस से बचने के लिए पूछ रहा है—हम असली मुद्दे को भाषा की बहस में कैसे डुबो दें?
