बांग्लादेश: शेख हसीना के बाद एक साल, अंतरिम सरकार राजनीतिक स्थिरता लाने में नाकाम

बांग्लादेश में पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार के खिलाफ छात्रों के नेतृत्व में हुई खूनी बगावत को एक साल पूरा हो चुका है, लेकिन देश अब भी राजनीतिक अनिश्चितता, मानवाधिकार उल्लंघनों और धार्मिक कट्टरपंथी दलों के फिर से उभरने जैसी समस्याओं से जूझ रहा है।

नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. मोहम्मद युनूस के नेतृत्व में बनी अंतरिम सरकार ने सुधारों और चुनावों का वादा किया था, लेकिन जमीनी हालात अब भी चिंताजनक बने हुए हैं। राज्य दमन में भले थोड़ी कमी आई हो, परंतु विपक्षी कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी और हिरासत में मौतों की खबरें लगातार सामने आ रही हैं।

राजनीतिक अनिश्चितता बरकरार

5 अगस्त 2024 को शेख हसीना देश छोड़कर चली गई थीं और इसके बाद मोहम्मद युनूस ने अंतरिम सरकार का गठन किया। उन्होंने दावा किया था कि वे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के जरिए लोकतंत्र को बहाल करेंगे, लेकिन अब तक चुनाव की कोई निश्चित तारीख तय नहीं हो सकी है।

BNP की नेता खालिदा जिया जहां दिसंबर 2025 या फरवरी 2026 में चुनाव चाहती हैं, वहीं युनूस अप्रैल 2026 की बात कर रहे हैं। इस बीच पूर्व सत्ताधारी दल आवामी लीग पर प्रतिबंध लगा हुआ है, जिससे चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं।

मानवाधिकारों का हनन

रिपोर्ट्स के अनुसार, पिछले एक साल में आवामी लीग के दर्जनों नेता हिरासत में मारे जा चुके हैं। मानवाधिकार संगठनों ने आरोप लगाया है कि सरकार विरोधी आवाज़ों को दबाने के लिए उत्पीड़न और अवैध हिरासतें जारी हैं।

जमात-ए-इस्लामी की वापसी

अंतरिम सरकार ने प्रतिबंधित जमात-ए-इस्लामी को दोबारा राजनीतिक गतिविधियों की अनुमति दे दी है। पूर्व धार्मिक नेताओं की रिहाई और इस पार्टी के बढ़ते प्रभाव ने राजनीतिक माहौल को और अधिक विभाजित कर दिया है। इससे धर्मनिरपेक्ष वर्गों में गहरी चिंता पैदा हो रही है।

युवा और महिलाओं का विरोध

बगावत में सक्रिय छात्र नेता अब “नेशनल सिटिज़न्स पार्टी” के बैनर तले सुधारों की मांग कर रहे हैं। महिलाएं और अल्पसंख्यक समुदाय भी सरकार के वादों के बावजूद वास्तविक बदलाव से निराश हैं। युवाओं की प्रमुख मांग है कि संविधान में बुनियादी बदलाव लाया जाए और एक पारदर्शी व्यवस्था कायम हो।

आर्थिक और सामाजिक संकट

हालांकि सरकार आर्थिक पुनरुद्धार ( एक सुस्त अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने की प्रक्रिया ) के दावे कर रही है, लेकिन आम जनता महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और असमानता जैसी समस्याओं से त्रस्त है। अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत और नागरिक स्वतंत्रताओं पर अंकुश भी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की चिंता का कारण बन रही है।

एक साल बाद भी अंतरिम सरकार देश को स्थिरता की ओर ले जाने में विफल रही है। सुधारों की प्रक्रिया धीमी है, जबकि राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक टकराव बांग्लादेश को फिर से एक नाज़ुक मोड़ पर ला खड़ा कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि पारदर्शी चुनाव और सबको साथ लेकर चलने वाली राजनीतिक रणनीति ही देश को इस संकट से बाहर निकाल सकती है।

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