उत्तराखंड के धराली गांव में हाल ही में हुई तबाही ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर पहाड़ी इलाकों में इस तरह की आपदाएं बार-बार क्यों हो रही हैं? क्या यह सिर्फ प्राकृतिक प्रकोप है या इसके पीछे इंसानी लापरवाही भी जिम्मेदार है?
धराली में आई आपदा जिसमें कई घर जमींदोज हो गए और दर्जनों लोग लापता हैं, ने पूरे राज्य को झकझोर कर रख दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की घटनाएं अब सिर्फ “एक्सेप्शन” नहीं बल्कि “नॉर्मल” बनती जा रही हैं।
भारतीय मौसम विभाग (IMD) की रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तराखंड में बीते 20 वर्षों में बादल फटने की घटनाओं में चार गुना वृद्धि हुई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण वातावरण में अधिक नमी रहती है, जिससे अचानक भारी वर्षा होती है और इससे भूस्खलन व बाढ़ जैसी आपदाएं होती हैं।
इसके अलावा Wadia Institute of Himalayan Geology की एक रिसर्च के अनुसार, उत्तरकाशी और धराली जैसे इलाके भूकंप और भूस्खलन की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील हैं। इसके बावजूद इन इलाकों में भारी निर्माण कार्य जैसे चारधाम हाइवे प्रोजेक्ट, सुरंगें और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स तेजी से चल रहे हैं।
NDMA (National Disaster Management Authority) के मुताबिक, भारत में 70% भूस्खलन की घटनाएं मानवजनित गतिविधियों जैसे कि सड़क निर्माण, जंगलों की कटाई और अतिक्रमण के कारण होती हैं।
हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स बना रहे हैं खतरे को और बड़ा
धराली क्षेत्र में चल रही पनबिजली परियोजनाओं में पहाड़ों की खुदाई और ब्लास्टिंग से जमीन की प्राकृतिक संरचना कमजोर हो रही है। DownToEarth की एक रिपोर्ट में यह साफ किया गया है कि ऐसे प्रोजेक्ट स्थानीय पारिस्थितिकी को गंभीर नुकसान पहुंचा रहे हैं।
NDMA की ताज़ा रिपोर्ट बताती है कि भारत के 70% पहाड़ी गांवों में Early Warning System या तो मौजूद नहीं हैं या वे ठीक से काम नहीं कर रहे। यही वजह है कि लोग समय रहते नहीं भाग पाते और जान-माल की भारी क्षति होती है।
क्या हो सकता है समाधान?
• पर्यावरणीय मूल्यांकन के बिना कोई बड़ा निर्माण कार्य स्वीकृत न किया जाए
• स्थानीय भूगर्भीय सर्वेक्षण के बाद ही सड़क और सुरंग निर्माण हो
• Early Warning System और बचाव तंत्र को मज़बूत किया जाए
• स्थानीय लोगों को आपदा प्रशिक्षण और जागरूकता प्रदान की जाए
• वनों की कटाई पर रोक और पुनर्वनीकरण को बढ़ावा दिया जाए
निष्कर्ष:
धराली जैसी आपदाएं अब असामान्य नहीं रहीं। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों में ऐसी घटनाएं और अधिक आम हो जाएंगी।
