सईद नकवी
विभाजन के विचार पर जवाहरलाल नेहरू शुरुआती एतराज और विरोध के बाद अंत तक कायल हो गए कि विभाजन के अलावा अन्य विकल्प नहीं है। खान अब्दुल गफ्फार खान जो उस समय देश के प्रमुख मुस्लिम नेताओं में से थे, कांग्रेस कार्यकारिणी की उस बैठक में रो पड़े थे, जिसमें देश के बंटवारे का प्रस्ताव पारित हुआ था।
मौलाना अबुल कलाम आजाद ने लिखा है कि जब पटेल और नेहरू विभाजन के पक्षधर हो गए थे, गांधी जी ही एकमात्र आशा की किरण थे। मौलाना ने 31 मार्च, 1947 को गांधीजी से मिलकर कह दिया “अब मेरी उम्मीद सिर्फ आपसे ही है। आप अगर विभाजन के खिलाफ पक्ष लें तो अब भी स्थिति को संभाला जा सकता है। यदि आप खामोश रहे तो मुझे डर है हम भारत का खो देंगे।” गांधी जी ने अत्यंत भावुक होकर जवाब में कहा कि कांग्रेस अगर विभाजन चाहती है तो “यह मेरी लाश पर होगा।” उन्होंने कहा वे जब तक जिंदा हैं, भारत का बंटवारा किए जाने पर कभी सहमत नहीं होंगे, न ही कांग्रेस को इसे स्वीकार करने देंगे।
घटनाक्रम आश्चर्यजनक रूप से एकदम बदल गया।
उसी दिन गांधी जी माउंटबेटन से मिले। अगले दिन फिर 2 अप्रैल को लार्ड माउंटबेटन की गांधी जी से मुलाकात हुई। गांधी जी माउंटबेटन से मुलाकात के बाद सरदार पटेल के पास आए और लगभग दो घंटे तक उनके साथ सलाह-मशवरा किया। मौलाना जब फिर गांधी जी से मिले तो बताया, “मुझे अपने जीवन में सबसे बड़ा धक्का लगा।” यानी कि गांधी जी बदल चुके थे। हालांकि उस वक्त तक वे खुल कर बंटवारे का पक्ष नहीं ले रहे थे, लेकिन “ वे विभाजन के विरोध में जोरदार तरीके से नहीं बोल रहे थे।” मौलाना को जिस बात से और अधिक आघात लगा और वे इतना अचंभित हुए वह यह था कि गांधी जी सरदार पटेल की दलीलों को दोहरा रहे थे। मौलाना गांधी जी के साथ दो घंटे तक बात करते रहे, उन्हें अपनी बात समझाने की कोशिश करते रहे लेकिन गांधी जी को प्रभावित करने में नाकामयाब रहे।
मौलाना के शब्दों में, “निराश होकर अंत में मैंने मायूसी से कहा : अगर आपका भी यही नजरिया है, तो मुझे भारत को तबाही से बचा सकने की कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही है।
गांधी जी ने जवाब में कहा वे पहले ही तह सुझाव दे चुके हैं कि जिन्ना से कहना चाहिए वे सरकार का गठन करें और अपने अनुसार मंत्रिमंडल के सदस्य चुन लें। गांधी जी ने यह भी बताया कि उन्होंने लार्ड माउंटबेटन से भी यही कहा है। .. पटेल और नेहरू दोनों ने ही गांधी जी के इस प्रस्ताव का पुरजोर विरोध किया और गांधी जी को मजबूर किया कि वे अपना प्रस्ताव वापस लें। आखिर गांधी जी ने मौलाना के समक्ष स्वीकारा कि अब विभाजन से बच पाना मुश्किल नजर आ रहा है। अब तय करने के लिए तय गया था कि विभाजन का स्वरूप क्या होगा। गांधी जी के शिविर में दिन-रात इस पर ही चर्चा होने लगी।
प्रस्तोता : कमल सिंह
(सईद नकवी अंतरराष्ट्रीय स्तर के ख्याति प्राप्त पत्रकार हैं। उनकी पुस्तक “वतन मे पराया भारत का मुसलमान” (Being the other : The Muslim In India) के अध्याय विभाजन का साया के अंश का संग्रह है। पुस्तक को Pharos Media & Publishers Pvt Ltd d-84 Abdul Fazal Enclave-1, Jamia nagar, New Dekhi -11oo25, India ने प्रकाशित किया है। पुस्तक का हिंदी अनुवाद कमल सिंह ने किया है। पुस्तक का उर्दू में भी अनुवादित है। सईद साहब ने यहां मौलाना अबुल कलाम की पुस्तक का हवाला दिया है वह है, “इंडिया विंस फ्रीडम”)
