आज़ादी की जंग के बेबाक सिपाही – बदरूद्दीन तैयबजी

बदरूद्दीन तैयबजी का ख़ानदान अहमदाबाद से ताल्लुक़ रखता था। इल्म हासिल करने के बाद उन्होंने अलीगढ़ और इंग्लैंड से ऊँची तालीम पाई। साल 1883 में जब अल्बर्ट बिल का मामला उठा और हिंदुस्तानियों के हक़ पर बात बढ़ी, तो तैयबजी बेख़ौफ़ होकर आगे आए। उस वक़्त वह बड़े मशहूर बैरिस्टर माने जाते थे।

आप बंबई की क़ानूनी कौंसिल के मेम्बर भी रहे और आज़ादी की हर तहरीक में दिलेरी से शामिल हुए। अंग्रेज़ी हुकूमत ने जब मुसलमानों को कांग्रेस से जुदा करने की साज़िश की, तो वायसराय ने उन्हें तोहफ़े देकर अपनी तरफ़ करने की कोशिश की। लेकिन तैयबजी ने ये तोहफ़ा लौटाते हुए साफ़ कहा कि हिंदू और मुसलमान मिलकर ही अपने मसाइल हल करेंगे।

सन 1887 में मद्रास के कांग्रेस अधिवेशन में तैयबजी को सदर चुना गया। अपने खिताब में इन्होंने कहा कि अगर भारत की तमाम कौमें मिलकर आवाज़ उठाएँ तो बड़े से बड़े हक़ हासिल किए जा सकते हैं। आपकी राय थी कि सिर्फ़ इत्तेहाद से ही हमारी आवाज़ बुलंद होगी और हमें इंसाफ़ मिलेगा।

इनकी कोशिशों से कांग्रेस मज़बूत हुई और मुसलमानों को यक़ीन हुआ कि जंग-ए-आज़ादी मिलजुल कर ही जीती जा सकती है। 19 अगस्त 1906 को आपने इस दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन आज़ादी के लिए तैयबजी की कुर्बानियाँ हमेशा याद रखी जाएँगी।

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