सैयद मीर निसार अली – आज़ादी के पहले जांबाज़

हिंदुस्तान की आज़ादी की जंग में सैयद मीर निसार अली, जिन्हें लोग टीपू मीर के नाम से जानते हैं, का अहम मुक़ाम है। 1782 में हैदरपुर गांव वेस्ट बंगाल में पैदा हुए टीपू मीर ने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ चलने वाले वहाबी आंदोलन को नई ताज़गी और मज़बूती दी।

1822 में हज से लौटकर उन्होंने ग़रीबों, किसानों और मज़लूमों को अंग्रेज़ी हुकूमत और ज़ालिम जमींदारों के ख़िलाफ़ एकजुट किया। उस वक़्त अंग्रेज़ सरकार ने मुसलमानों और जमींदारों पर सख़्त टैक्स लगा दिए थे। मीर निसार अली ने फ़ैसला किया कि अब सीधा मुक़ाबला होगा। उन्होंने अपने साथियों को हथियार चलाना सिखाया और अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ लड़ाई के लिए बांस का क़िला (Bamboo Fort) बनाया।

19 नवंबर 1831 को अंग्रेज़ फौज ने नार्केलबाड़ी पर हमला किया। टीपू मीर अपने जांबाज़ साथियों के साथ बहादुरी से लड़े। कुछ इतिहासकारों के मुताबिक़ उन्हें गोली मार दी गई, जबकि कुछ का कहना है कि गिरफ़्तार करके फांसी दी गई।

उनकी शहादत ने आने वाली पीढ़ियों को हक़ और आज़ादी के लिए लड़ने का जज़्बा दिया। सैयद मीर निसार अली को हिंदुस्तान की आज़ादी की तहरीक के पहले शहीदों में गिना जाता है।

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