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अलीगढ़ के ज़मींदार ख़ानदान में 1885 में जन्मे अब्दुल मजीद ख़्वाजा ने अपनी पूरी ज़िंदगी मुल्क की आज़ादी और तालीम के लिए समर्पित की। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से वकालत की पढ़ाई के दौरान उनकी मुलाक़ात महात्मा गांधी से हुई और वहीं से उनका रुख हिंदुस्तान की आज़ादी की जंग की ओर हो गया।
1910 में वतन लौटकर उन्होंने वकालत शुरू की और जल्द ही बेहतरीन क़ानूनविद के रूप में पहचाने जाने लगे। उनकी पत्नी बेगम खुर्शीद भी आज़ादी की सक्रिय नेता थीं। दोनों पति-पत्नी ने मिलकर असहयोग और खिलाफ़त आंदोलनों में अहम भूमिका निभाई। 1919 में जेल जाने के बाद रिहाई पर उन्होंने जामिया मिल्लिया इस्लामिया की बुनियाद रखने में अहम योगदान दिया। उनका मानना था कि मुसलमानों को ऊँची और आधुनिक तालीम देना भी आज़ादी की लड़ाई का हिस्सा है।
1943 में डॉ. जाकिर हुसैन के कहने पर वे जामिया के वाइस-चांसलर बने और ज़िंदगी भर इस पद पर रहे। गांधीजी के क़रीबी माने जाने वाले ख़्वाजा साहब हमेशा हिंदू-मुस्लिम एकता और मज़हबी इत्तेहाद के पैरोकार रहे। बँटवारे के बाद मुसलमानों में पैदा हुई मायूसी को दूर करने और तालीम का शौक़ जगाने में उनका बड़ा योगदान रहा।
2 दिसम्बर 1962 को उनका इंतकाल हुआ। लेकिन अब्दुल मजीद ख़्वाजा का नाम हिंदुस्तान की आज़ादी और तालीमी तहरीक में हमेशा सुनहरे अक्षरों में दर्ज रहेगा।
