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सैयद साहिल आग़ा की सफलता की कहानी इस बात का सबूत है कि जुनून और लगन किसी भी पुरानी कला को फिर से ज़िंदा कर सकता है। दिल्ली में जन्मे और जामिया मिलिया इस्लामिया में पढ़े साहिल आग़ा को छात्र जीवन में ही कहानी कहने का शौक हो गया था। उन्हें महसूस हुआ कि लोग पढ़ने से ज़्यादा सुनना पसंद करते हैं, और इसी सोच ने उन्हें एक अनोखे सफ़र पर आगे बढ़ाया।
उन्होंने पहले दास्तान-ए-हिंद नाम की किताब लिखी और फिर उसी को वीडियो रूप में पेश कर अपने कहानीकार जीवन की शुरुआत की। वह बताते हैं कि किस्सागोई एक सूफ़ियाना विरासत है, जो प्यार, शांति और गंगा-जमनी तहज़ीब का संदेश देती है। इसी सोच के साथ उन्होंने इस कला को नए दौर की ज़रूरत के हिसाब से ढाला।
साहिल ने “म्यूज़िकल स्टोरीटेलिंग” की नई शैली शुरू की, जिसमें भारतीय ओपेरा और शास्त्रीय संगीत को कहानियों में जोड़ा जाता है। यह प्रयोग खास तौर पर युवाओं को पसंद आया और उन्हें देश-विदेश में पहचान मिली। उन्होंने दास्तान-ए-ग़ालिब, दास्तान-ए-अमीर ख़ुसरो और दास्तान-ए-सुल्तान सलाउद्दीन जैसी कई दास्तानें पेश कीं।
आज उनकी दास्तानें लोगों में प्यार और इंसानियत का संदेश भरती हैं। स्टेज से उतरते ही अलग-अलग धर्मों के लोग उन्हें गले लगाते हैं— और यही मोहब्बत उनके लिए असली सफलता है।
