(डॉ शुजाअत अली क़ादरी)
अमेरिका ने नवंबर 2025 में अपनी नई National Security Strategy जारी की है। यह दस्तावेज़ न सिर्फ़ उसकी विदेश पॉलिसी और फ़ौजी सोच को नए सिरे से बयान करता है, बल्कि आने वाले सालों में दुनिया के शक्ति संतुलन पर भी इसका गहरा असर पड़ने वाला है। यह स्ट्रैटेजी साफ़ दिखाती है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का फ़लसफ़ा America First अब अमेरिकी पॉलिसी का असल मरकज़ बन चुका है। यह तरीका पुराने उदार अंतरराष्ट्रीयवाद से हटकर एक ऐसी नीति पेश करता है जो अमेरिकी हितों को सख़्त, साफ़ और कभी-कभी टकराव वाली लकीरों में परिभाषित करती है।
स्ट्रैटेजी का पहला बड़ा पैग़ाम यह है कि अमेरिका अब अपने राष्ट्रीय हितों को दुनिया भर की अनिश्चित, फैली हुई जिम्मेदारियों में नहीं खोएगा। दस्तावेज़ के मुताबिक, कोल्ड वॉर के बाद अमेरिका ने कई जगह दख़ल देकर, अंतरराष्ट्रीय संस्थानों पर ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा करके और “हमेशा के प्रभुत्व” की तलाश में अपनी आर्थिक, फ़ौजी और सामाजिक ताक़त को नुक़सान पहुँचाया। नई स्ट्रैटेजी इन सबको नकारते हुए एक साफ़ लक्ष्य तय करती है अमेरिका की सुरक्षा, उसकी सीमाओं की हिफ़ाज़त, उसकी अर्थव्यवस्था की मज़बूती और उसकी फ़ौजी क्षमता को पहले से ज़्यादा ताक़तवर बनाना।
स्ट्रैटेजी का दूसरा अहम पहलू है “Power Through Strength” यानी अमन और सुरक्षा, मज़बूत ताक़त के ज़रिये। दस्तावेज़ कहता है कि अमेरिका तभी महफ़ूज़ रहेगा जब उसकी फ़ौजी क़ूवत, आर्थिक मजबूती और टेक्नोलॉजी में बढ़त बे मिसाल रहे। इसी लिए न्यूक्लियर हथियारों का आधुनिकीकरण, मिसाइल डिफ़ेंस सिस्टम को और मज़बूत करना और फ़ौज को आधुनिक साज़ो सामान से लैस करना इसकी प्राथमिकताओं में है। साथ ही साइबर सिक्योरिटी, क्वांटम टेक्नोलॉजी, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और एनर्जी सेक्टर को आने वाली दुनिया की असली जंगों का मैदान माना गया है। नतीजा भविष्य की राजनीति बंदूकों से कम और टेक्नोलॉजी व इंडस्ट्री की ताक़त से ज़्यादा तय होगी।
तीसरा अहम नुक्ता यह है कि अमेरिका अब बे क़ाबू माइग्रेशन को क़ौमी अस्तित्व का मसला मान रहा है। बॉर्डर सिक्योरिटी को सीधे-सीधे नेशनल सिक्योरिटी से जोड़ा गया है। दस्तावेज़ यह इशारा देता है कि देश की जनसंख्या पॉलिसी, सरहदों का नियंत्रण और प्रवासन व्यवस्था सब अमेरिका की दीर्घकालिक स्थिरता और सांस्कृतिक बनावट से जुड़ी हुई हैं।
भू-राजनीति के लिहाज़ से स्ट्रैटेजी पाँच बड़े इलाक़ों पर फ़ोकस करती है पश्चिमी गोलार्ध, एशिया, यूरोप, मध्य पूर्व और अफ़्रीका।
पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिका “ट्रंप कोरोलरी” के तहत ये दावा दोहराता है कि इस इलाके में किसी बाहरी ताक़त को घुसपैठ की इजाज़त नहीं दी जाएगी। इसका मतलब साफ़ है अगर चीन या रूस लैटिन अमेरिका में आर्थिक या सामरिक असर बढ़ाने की कोशिश करें, तो अमेरिका इसका कड़ा जवाब देगा।
एशिया में स्ट्रैटेजी का सबसे बड़ा केंद्र चीन की बढ़ती ताक़त को बैलेंस करना है। दस्तावेज़ मानता है कि चीन के साथ आर्थिक रिश्ते गहरे हैं, लेकिन यही रिश्ते आने वाले दिनों में और सख़्त प्रतिस्पर्धा का रूप ले सकते हैं। इसी लिए अमेरिका सप्लाई चेन को अपने करीबियों भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया की तरफ़ ले जाने पर ज़ोर दे रहा है। इंडो-पैसिफ़िक में सैन्य संतुलन और ताइवान की सुरक्षा भी अहम मुद्दे हैं। भारत को इस पूरी रणनीति में एक मुख्य पार्टनर की तरह पेश किया गया है ख़ासकर टेक्नोलॉजी, व्यापार और डिफ़ेंस के मोर्चे पर।
यूरोप की तस्वीर भी इसमें दिलचस्प है। दस्तावेज़ दावा करता है कि यूरोप “सभ्यतागत बेचैनी” से गुज़र रहा है कम होती आबादी, माइग्रेशन का दबाव, आर्थिक सुस्ती और सांस्कृतिक असुरक्षा के चलते। अमेरिका चाहता है कि यूरोप अपनी रक्षा खुद मजबूत करे, NATO पर बोझ कम करे और रूस के साथ एक स्थिर रिश्ता बनाए, ताकि महाद्वीप में लंबे वक़्त की शांति बहाल हो सके।
मध्य पूर्व को लेकर एक बड़ी नई बात यह है कि अमेरिका पहली बार मान रहा है कि यह इलाक़ा अब उसकी फ़ॉरेन पॉलिसी का “सबसे बड़ा बोझ” नहीं रहा। एनर्जी डिपेंडेंसी कम हो गई है, और कई अरब मुल्कों के बीच हुए सुलह-सफ़ाई समझौते एक नई दिशा दिखा रहे हैं। ईरान पर क़ाबू और अब्राहम अक़ॉर्ड्स का विस्तार दोनों को अमेरिकी प्राथमिकता बताया गया है।
अफ़्रीका के लिए अमेरिका ने मदद (aid) की बजाय निवेश (investment) और व्यापार पर आधारित मॉडल अपनाने का फ़ैसला किया है।
आख़िर में, यह स्ट्रैटेजी अमेरिका में एक बड़ा और साफ़-सुथरा मोड़ दिखाती है। यह दस्तावेज़ अमेरिकी ताक़त को फिर से गढ़ने, अपने वैश्विक गठबंधनों को नए अंदाज़ में ढालने और आने वाली टेक्नोलॉजी की जंग में निर्णायक बढ़त हासिल करने की कोशिश है। यह दुनिया को यह संदेश भी दे रहा है कि अब अमेरिका “दुनिया का पहरेदार” नहीं, बल्कि “अपनी प्राथमिकताओं के मुताबिक़ फ़ैसला करने वाला देश” होगा—जो हर कदम अपने हित को सामने रखकर उठाएगा।
