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फ़िलिस्तीनी प्रतिरोध संगठन हमास की सैन्य शाखा अल-क़स्साम ब्रिगेड्स के प्रवक्ता अबू ओबैदा पिछले दो दशकों तक संघर्ष से जुड़ी मीडिया कवरेज का एक अहम चेहरा रहे हैं । नक़ाबपोश पहचान और सख़्त भाषा में दिए गए बयानों के कारण वे समर्थकों के लिए हौसले की आवाज़ बने, और इज़राइल के लिए चिंता का कारण।
अबू ओबैदा पहली बार सितंबर 2004 में ग़ज़ा के जबालिया शरणार्थी शिविर में एक संक्षिप्त प्रेस बयान के ज़रिये सामने आए। उस समय वे कथित तौर पर 18 वर्ष के थे। अपने पहले ही बयान में उन्होंने इज़राइली सैन्य कार्रवाइयों की आलोचना की और उत्तरी ग़ज़ा में जारी झड़पों का ज़िक्र किया। यही बयान आगे चलकर उनकी सार्वजनिक पहचान की शुरुआत बना।
2007 में उन्हें औपचारिक रूप से अल-क़स्साम ब्रिगेड्स का प्रवक्ता नियुक्त किया गया। इससे ठीक एक वर्ष पहले उन्होंने उस ऑपरेशन की घोषणा की थी, जिसमें इज़राइली सैनिक गिलाद शालित को बंदी बनाया गया था। इसके बाद हर बड़े संघर्ष के दौरान अबू ओबैदा लगातार मीडिया के सामने आते रहे।
2008 के ग़ज़ा युद्ध, 2014 की लड़ाई और 2021 के सैफ़ अल-क़ुद्स संघर्ष में उनके बयानों ने समर्थकों का मनोबल बनाए रखा। उन्होंने इज़राइली नुक़सान और प्रतिरोध की कार्रवाइयों से जुड़ी जानकारियाँ साझा कीं। लेकिन, उनकी भाषा सख़्त संगठित रही, जिसने उन्हें एक अलग पहचान दी।
7 अक्टूबर के बाद शुरू हुए हालात में भी अबू ओबैदा लगातार बयान देते रहे। लंबे संघर्ष और ग़ज़ा की परिस्थितियों का असर उनकी सेहत पर भी दिखा, इस सब के बाद भी उनकी मीडिया भूमिका जारी रही।
रिपोर्ट बताती है कि अबू ओबैदा की जन्म-तिथि सार्वजनिक नहीं थी। उनकी मृत्यु 30 अगस्त 2025 को हुई। समर्थकों के अनुसार, उन्होंने अपना पूरा वयस्क जीवन प्रतिरोध की आवाज़ को दुनिया तक पहुँचाने में समर्पित कर दिया।
