अंधेरे से उजाले तक: मदरसा इमदादिया और मोहम्मद उस्मान की सफलता की कहानी

तमिलनाडु के रानीपेट जिले के मेलविशारम की एक संकरी गली में शुरू हुआ एक छोटा-सा प्रयास आज सैकड़ों अंधे बच्चों की ज़िंदगी बदल रहा है। इस बदलाव के केंद्र में हैं मोहम्मद उस्मान और उनका सपना—ऐसा सपना, जिसने अंधेरे में जी रहे बच्चों को शिक्षा के उजाले से जोड़ दिया।

इस सफलता की सबसे सशक्त कहानी अशरफ खान की है। जन्म से अंधे अशरफ एक बेहद गरीब परिवार में पैदा हुए थे। उनके लिए स्कूल जाना या कॉलेज में पढ़ाना कभी कल्पना का हिस्सा भी नहीं था। मेलविशारम के एक छोटे से मदरसे में उन्होंने ब्रेल लिपि सीखी और वहीं से उनके जीवन की दिशा बदल गई। आज अशरफ चेन्नई के एक निजी कॉलेज में तमिल पढ़ाते हैं और लगभग 50 हजार रुपये मासिक कमाते हैं। वे गर्व से कहते हैं, “शिक्षा ने मेरी ज़िंदगी को बचाया।” यह केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की जीत है, जिसे मोहम्मद उस्मान ने खड़ा किया।

मोहम्मद उस्मान को यह राह तब सूझी, जब उन्होंने अंधे बच्चों को मंदिरों और मस्जिदों के बाहर अपने माता-पिता के साथ भीख मांगते देखा। उन्होंने महसूस किया कि गरीबी और अंधापन मिलकर एक पीढ़ी को पूरी तरह हाशिये पर धकेल देते हैं। इसी पीड़ा से जन्म हुआ मदरसा इमदादिया का, जिसने सड़कों से बच्चों को उठाकर कक्षा तक पहुँचाया।

आज यह मदरसा 5,000 वर्ग फुट के परिसर में संचालित एक अर्द्ध-आवासीय संस्थान है, जहाँ 50 अंधे बच्चे रहकर पढ़ते हैं। यहाँ ब्रेल में कुरान और हदीस की शिक्षा के साथ-साथ ऑडियो माध्यम से स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई कराई जाती है। बच्चों को केवल पढ़ाया ही नहीं जाता, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर बनाया जाता है।

इस संस्था से निकली कहानियाँ सिर्फ आँकड़े नहीं हैं। मोबिना जैसी छात्राएँ, जो कभी बेहद असुरक्षित हालात में थीं, आज सरकारी स्कूलों में शिक्षक हैं और सम्मानजनक वेतन कमा रही हैं। कई छात्र सरकारी सेवाओं में हैं, कोई रेलवे में काम कर रहा है तो कोई शिक्षक बन चुका है।

मोहम्मद उस्मान का सपना अभी पूरा नहीं हुआ है। वे चाहते हैं कि हर जिले में अंधों के लिए स्कूल और हर गाँव में ट्यूशन सेंटर हों। मदरसा इमदादिया की सफलता यह साबित करती है कि सही दिशा, संवेदना और शिक्षा मिल जाए, तो अंधापन भी भविष्य देखने से नहीं रोक सकता।

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