कहते हैं सपनों की कोई उम्र नहीं होती, और इस कहावत को सच कर दिखाया है अनंतनाग के कोकेरनाग की 14 वर्षीय छात्रा शिबा अशरफ ने। बेहद कम उम्र में शिबा ने अपनी पहली उर्दू पुस्तक “A Musht-e-Khaak” प्रकाशित कर कश्मीर की सबसे कम उम्र की उर्दू लेखिका बनने का गौरव हासिल किया है।
शिबा वर्तमान में कक्षा 9 की छात्रा हैं और पढ़ाई के साथ-साथ साहित्य के प्रति उनका गहरा रुझान रहा है। उनकी किताब भावनाओं, आत्मअनुभवों और जीवन के सूक्ष्म पहलुओं को उर्दू भाषा में खूबसूरती से पेश करती है। शिबा मानती हैं कि लेखन उनके लिए केवल शब्द नहीं, बल्कि अपने विचारों और भावनाओं को आज़ाद करने का माध्यम है।
एक छोटे से कस्बे से निकलकर इतनी बड़ी उपलब्धि हासिल करना आसान नहीं था, लेकिन मेहनत, लगन और परिवार के सहयोग ने उनके सपने को हकीकत में बदला। उन्होंने प्रसिद्ध लेखिकाओं से प्रेरणा लेकर अपने लेखन को निखारा।
शिबा अशरफ की यह सफलता न सिर्फ कश्मीर बल्कि पूरे देश की युवा लड़कियों के लिए प्रेरणा है। उनकी कहानी यह साबित करती है कि अगर हौसले बुलंद हों, तो उम्र और सीमाएँ कोई मायने नहीं रखतीं।
