ज़ीरो से शिखर तक: इरफ़ाना तबस्सुम की जिद ने बदल दी कश्मीर के एक सरकारी स्कूल की तक़दीर

श्रीनगर: कश्मीर के बडगाम ज़िले के रहलपुरा इलाके में स्थित एक सरकारी प्राइमरी स्कूल आज उम्मीद, बदलाव और समर्पण की मिसाल बन चुका है। जिस स्कूल में कभी एक भी छात्र नहीं था, वही आज शिक्षा का उजाला फैलाने वाला केंद्र बन गया है। इस ऐतिहासिक बदलाव के केंद्र में हैं शिक्षिका इरफ़ाना तबस्सुम, जिनकी मेहनत, दूरदृष्टि और अटूट संकल्प ने असंभव को संभव कर दिखाया।

जम्मू-कश्मीर शिक्षा विभाग से जुड़ी इरफ़ाना तबस्सुम ने वर्ष 2007 में शिक्षक के रूप में अपने करियर की शुरुआत की थी। वर्षों के अनुभव, प्रशिक्षण और आधुनिक शिक्षण तकनीकों की समझ ने उन्हें एक संवेदनशील और नवाचारी शिक्षक के रूप में गढ़ा। लेकिन असली परीक्षा तब शुरू हुई जब 2013 में उन्हें रहलपुरा के उस सरकारी प्राइमरी स्कूल की ज़िम्मेदारी दी गई, जो लगभग बंद हो चुका था न छात्र, न भरोसा और न ही भविष्य।

टूटी हुई इमारत, सूना परिसर और शून्य नामांकन हालात बेहद निराशाजनक थे। लेकिन इरफ़ाना तबस्सुम ने हार मानने के बजाय इसे एक मिशन बना लिया। उन्होंने सबसे पहले स्कूल का माहौल बदला। कक्षाओं को संवारा, फर्नीचर दुरुस्त कराया और स्कूल को बच्चों के लिए आकर्षक व सुरक्षित बनाने पर ज़ोर दिया। अभिभावकों से सीधा संवाद किया, उन्हें भरोसा दिलाया कि यह स्कूल उनके बच्चों के भविष्य की मजबूत नींव बनेगा।

धीरे-धीरे असर दिखने लगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप फाउंडेशनल लर्निंग और स्किल-बेस्ड एजुकेशन को स्कूल में लागू किया गया। पढ़ाई को किताबों की सीमाओं से बाहर निकालते हुए बच्चों को खेल, बागवानी और व्यवहारिक गतिविधियों से जोड़ा गया। नियमित मूल्यांकन, छात्र प्रोफाइलिंग और योजनाबद्ध पाठ्यक्रम ने शिक्षा को व्यवस्थित और प्रभावी बनाया।

इरफ़ाना तबस्सुम की लगन का दायरा सिर्फ़ कक्षा तक सीमित नहीं रहा। उनके प्रयासों से स्कूल को अतिरिक्त ज़मीन भी मिली और आज परिसर छह से सात कनाल में फैल चुका है। भविष्य में यहाँ नए भवन, खेल मैदान और बेहतर सुविधाएँ विकसित करने की योजना है। उन्होंने स्कूल को मिडिल या हाई स्कूल में अपग्रेड करने की मांग भी रखी है, ताकि बच्चों को दूर न जाना पड़े।

आज वही स्कूल 70 से अधिक छात्रों की किलकारियों से गूंज रहा है। इस असाधारण योगदान के लिए इरफ़ाना तबस्सुम को ज़िला प्रशासन और जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा कई सम्मानों से नवाज़ा गया। शिक्षक दिवस पर उन्हें लेफ्टिनेंट गवर्नर द्वारा स्टेट टीचर अवॉर्ड मिलना उनके संघर्ष की सबसे बड़ी पहचान बना।

इरफ़ाना तबस्सुम मानती हैं कि शिक्षक केवल पाठ नहीं पढ़ाता, वह समाज का भविष्य गढ़ता है। उनके अनुसार ईमानदारी, निरंतर मेहनत और अपने पेशे से प्रेम ही असली सफलता की कुंजी है।

रहलपुरा का यह सरकारी प्राइमरी स्कूल आज सिर्फ़ एक स्कूल नहीं, बल्कि यह संदेश है कि मजबूत इरादों से व्यवस्था भी बदली जा सकती है। इरफ़ाना तबस्सुम की कहानी कश्मीर ही नहीं, पूरे देश के शिक्षकों और समाज के लिए प्रेरणा है कि अगर नीयत साफ़ हो, तो ज़ीरो से भी इतिहास रचा जा सकता है।

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