ग़ाज़ा: भय और अनिश्चितता के बीच, उम्मीद की किरण बनी ये शिक्षिका

ग़ाज़ा में हर सुबह, सालवा नामक एक शिक्षिका अस्थाई शिक्षण केन्द्र का दरवाज़ा खोलती हैं और अपने काम में जुट जाती हैं. सालवा अस्थिर हालात के बीच अपनी कक्षा में आने वाले बच्चों के लिए, एक सुरक्षित सहारे की तरह है. उनकी कक्षा सिर्फ़ पाठन-लेखन की जगह भर नहीं है, बल्कि एक ऐसा स्थान है, जहाँ बच्चे फिर से स्वयं को देखा और समझा हुआ महसूस कर पाते हैं.

सालवा, शान्त आवाज़ और हर बच्चे पर गहरी संवेदनशीलता के साथ ध्यान देते हुए, डर, नुक़सान और अनिश्चितता से घिरे माहौल में बच्चों को सुकून और भरोसे का अहसास दिलाती हैं. 

उनकी एक छात्रा लयान कहती है, “जब सालवा मैम हमारे साथ होती हैं, तो हमें सुरक्षित महसूस होता है और वह हमें अपनी भावनाएँ खुलकर व्यक्त करने देती हैं.”

वहीं अहमद का कहना है, “वह हमें बिना बोले भी समझ जाती हैं और हमें बिना किसी डर के बात करने और खेलने देती हैं.”

भावनाएँ व्यक्त कर पा रहे हैं बच्चे 

सालवा, सीखने के सामाजिक-भावनात्मक तरीक़ों के ज़रिए, बच्चों को अपनी भावनाएँ व्यक्त करने की जगह देती हैं.

वह सम्वाद के लिए दायरे बनाती हैं, बच्चों को अपने डर के बारे में खुलकर बात करने में मदद करती हैं और खेल, आत्मचिन्तन व दिनचर्या के लिए जगह तैयार करती हैं.

ये छोटे लेकिन बेहद अहम क़दम हैं, उन बच्चों के लिए जिनकी ज़िन्दगी गहराई से प्रभावित हुई है.

सालवा के लिए यह प्रशिक्षण केवल पेशेवर विकास तक सीमित नहीं था. इस अनुभवन ने उन्हें एक अस्थाई शिक्षण स्थान को एक ऐसे अर्थपूर्ण स्थल में बदलने में मदद की, जहाँ बच्चे फिर से स्थिरता और उम्मीद का अहसास पा सकें.

कठिनाइयों से भरा जीवन

सालवा की अपनी ज़िन्दगी भी कठिनाइयों से घिरी हुई है, वह उसी दुनिया का हिस्सा हैं, जिसे उनके छात्र रोज़ झेलते हैं.

सालवा स्वयं भी, युद्ध के कारण विस्थापित हो चुकी हैं. वह अपने परिवार के लिए आय अर्जित करने वाली प्रमुख सदस्य हैं, जिसमें उनकी बीमार माँ और सधुमेह से ग्रस्त उनका बेटा ज़ैन शामिल है.

सालवा, घर और रोज़गार खोने के बाद अब ग़ाज़ा में एक छोटे से तम्बु में रहती हैं. उन पर न केवल परिवार की आर्थिक ज़िम्मेदारी है, बल्कि अपनी माँ की देखभाल और ज़ैन की सेहत पर लगातार नज़र रखना भी उनकी ही ज़िम्मेदारी है.

फिर भी, वह अडिग रही हैं.

सालवा कहती हैं, “मेरे पास मज़बूत बनने के अलावा कोई विकल्प नहीं था. मेरी ताक़त मेरे बेटे और ख़ुद के प्रति मेरी ज़िम्मेदारी से आती है.”

सालवा, अपने बेटे ज़ैन की चिन्ता, उसके इलाज की व्यवस्था करने के संकल्प और अपनी माँ की देखभाल के बीच, हर दिन इस मज़बूती का सहारा लेती हैं.

छठी कक्षा में पढ़ने वाला ज़ैन अपनी माँ के बारे में गर्व से बात करता है.

वो कहता है कि, “मेरी माँ ही मेरी सुरक्षा हैं… उन्होंने ही मुझे मज़बूत बनना सिखाया है.”

केवल आय का ज़रिया नहीं

सालवा के लिए काम पर लौटना सिर्फ़ आमदनी का ज़रिया नहीं रहा. इसने उनकी गरिमा की भावना को फिर से स्थापित करने में मदद की, बेटे के इलाज में सहारा दिया और महीनों की उथल-पुथल के बाद कुछ स्थिरता भी वापस लाई.

उनकी कहानी यह याद दिलाती है कि जब संकट के समय महिलाओं को समर्थन मिलता है, तो उसका सकारात्मक असर सिर्फ़ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह बच्चों, परिवारों और पूरे समुदाय तक फैलता है.

सालवा की कहानी ग़ाज़ा की एक व्यापक सच्चाई को दर्शाती है: महिलाएँ सिर्फ़ इस संकट को झेल ही नहीं रहीं, बल्कि परिवारों का सहारा बन रही हैं, समुदायों को सम्भाल रही हैं और बेहद मुश्किल हालात में भी देखभाल और निरन्तरता के लिए जगह बना रही हैं.

OPT मानवीय कोष

सालवा ने इन कौशलों को, ग़ाज़ा में ‘अध्यापक रचनात्मकता केन्द्र’ द्वारा चलाए जा रहे एक कार्यक्रम के ज़रिए और मज़बूत किया. 

यह कार्यक्रम अन्तरराष्ट्रीय गै़र-सरकारी संगठन War Child के सहयोग से और संयुक्त राष्ट्र मानवतावादी कार्यालय (OCHA) द्वारा प्रबन्धित OPT मानवीय कोष के समर्थन से संचालित है.

यह पहल, शिक्षकों को संकट की परिस्थितियों में शिक्षा और सीखने के सामाजिक-भावनात्मक अनुभव के लिए व्यावहारिक उपकरण प्रदान करती है, ताकि वे युद्ध और विस्थापन झेल रहे बच्चों को बेहतर तरीके़ से सहारा दे सकें.

War Child और उसके साझीदारों के लिए यह समर्थन बेहद अहम साबित हुआ है.

Source : UN News

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