एक फोन कॉल… और बिखर गई सुलह की सारी उम्मीदें! इस्लामाबाद वार्ता की अंदरूनी कहानी ने दुनिया को चौंकाया

इस्लामाबाद में चल रही अमेरिका और ईरान के बीच हाई-प्रोफाइल शांति वार्ता ने उस वक्त सबको हैरान कर दिया, जब समझौते की दहलीज पर पहुंची बातचीत अचानक टूट गई। 12 अप्रैल 2026 को हुई यह 21 घंटे लंबी मैराथन मीटिंग आखिरकार बिना किसी नतीजे के खत्म हो गई! और इसके पीछे की वजह ने पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया है।

ईरान का दावा है कि जब दोनों देश एक समझौते से बस “कुछ इंच” दूर थे, तभी एक फोन कॉल ने पूरा खेल पलट दिया। यह कॉल इजरायल के प्रधानमंत्री की ओर से आया बताया जा रहा है। ईरानी विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची के मुताबिक, जैसे ही यह कॉल अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस तक पहुंचा, बातचीत का रुख अचानक बदल गया।

जो चर्चा अब तक अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने पर केंद्रित थी, वह धीरे-धीरे इजरायल के हितों की ओर मुड़ गई। अराघची ने इसे साफ तौर पर बाहरी हस्तक्षेप बताया और कहा कि अमेरिका बातचीत की मेज पर वह हासिल करना चाहता था, जो वह युद्ध के मैदान में नहीं कर सका।

दिलचस्प बात यह है कि इस पूरे घटनाक्रम पर अमेरिका की ओर से अब तक कोई साफ प्रतिक्रिया नहीं आई है, न इस फोन कॉल की पुष्टि हुई है और न ही इसका खंडन। इससे मामले ने और ज्यादा रहस्य और गंभीरता ले ली है।

वार्ता के दौरान अमेरिका ने ईरान के सामने सख्त शर्तें रखीं — होर्मुज जलडमरूमध्य में अपने जहाजों के लिए सुरक्षित रास्ता, ईरान का यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम पूरी तरह खत्म करना और मौजूदा यूरेनियम स्टॉक को सौंपना। अमेरिका ने इसे “अंतिम और सर्वश्रेष्ठ प्रस्ताव” बताया, लेकिन ईरान ने इन शर्तों को अपनी संप्रभुता के खिलाफ बताते हुए सिरे से खारिज कर दिया।

इस असफल बातचीत का असर अब दुनिया भर में महसूस किया जा रहा है। कच्चे तेल की कीमतें, जो हाल ही में 95 डॉलर तक गिर गई थीं, अब फिर से 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य में पहले से ही व्यापार लगभग ठप है, जिससे वैश्विक ऊर्जा संकट की आशंका और गहरा गई है।

इतना ही नहीं, इस घटनाक्रम ने अमेरिका और उसके सहयोगियों के बीच बढ़ती दूरी को भी उजागर कर दिया है। स्पेन और इटली जैसे नाटो देशों ने ईरान के खिलाफ किसी भी सैन्य कार्रवाई में अपने क्षेत्र के इस्तेमाल से इनकार कर दिया है। कई यूरोपीय और खाड़ी देश भी इस टकराव से दूरी बनाए हुए हैं।

अब सबकी नजरें अगले नौ दिनों पर टिकी हैं! क्योंकि संघर्षविराम खत्म होने वाला है। अगर इस बीच कोई नया समझौता नहीं हुआ, तो खाड़ी क्षेत्र एक बार फिर बड़े युद्ध की आग में झुलस सकता है।

इस्लामाबाद की यह कहानी सिर्फ एक असफल बातचीत नहीं, बल्कि यह दिखाती है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कभी-कभी एक फोन कॉल ही पूरी दुनिया की दिशा बदल देता है।

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