By : प्रशान्त टंडन
राहुल गांधी ने पहाड़ को धक्का दिया है:
मैंने राहुल गांधी को कभी उस चश्मे से नहीं देखा जो कॉर्पोरेट ने 2010 की उनकी नियामगिरी और भट्टापरसौल की यात्राओं के बाद दिखाया.
सबसे अच्छी बात जो उनमे देखी कि विचारधारा को लेकर दो दशक में वो इंच भी नहीं भटके.
2010 में ही मैंने महसूस किया था कि राहुल गांधी ने कांग्रेस के गिरावट की नब्ज़ पकड़ ली है और पार्टी को वापिस पटरी में लाने के लिये काम कर रहे हैं.
राजीव गांधी के बाद से कांग्रेस ने अपनी परंपरागत वैचारिक ज़मीन छोड़ दी थी. उसका झुकाव आर्थिक और राजनीतिक दक्षिणपंथ की तरफ़ हो गया था. डॉ मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियों ने एक नया मिडिल क्लास बनाया जो कांग्रेस का था ही नहीं – जो सामाजिक पायदान में पहले से उपर थे वही आर्थिक रूप से भी संपन्न हुये.
इसी मिडिल क्लास से काग्रेस की मिडिल लेवल लीडरशिप आई जो कांग्रेस की वैचारिक ज़मीन से नहीं जुड़ी थी. जब राहुल गांधी ने कांग्रेस के स्ट्रक्चर को बदलने का अभियान शुरु किया तब अंदर और बाहर दोनों तरफ़ से उन पर हमला हुआ. एक सुनियोजित साजिश रची गई उनके खिलाफ़. कॉर्पोरेट और आरएसएस का उनके खिलाफ़ एक एलायंस बना. इतने सुनियोजित निगेटिव कैंपेन की मिसाल पूरी दुनिया में नहीं है.
2020-21 में शायद उन्हे समझ में आ गया कि कांग्रेस को भीतर से बदलना संभव नहीं है. मिडिल लीडरशिप कुंडली मारे बैठी है. उसका क्लास करेक्टर कांग्रेस की विचारधारा से मेल नहीं खाता. तब उन्होंने महात्मा गांधी का रास्ता अपनाया और पार्टी को बाहर से बदलने का काम शुरु किया.
दो बार भारत जोड़ों यात्राएं की, देश के लोगों से संवाद स्थापित किया जो आज भी जारी है.
इस प्रोसेस में कांग्रेस को उसकी मूल विचारधारा में ले जाने में कामयाब हुए. पार्टी अध्यक्ष के रूप में मल्लिकार्जुन खड़गे के बिना शायद ये काम आसान न होता. समाज के वो तमाम वर्ग जो कांग्रेस को छोड़ चुके थे अब वापिस आ रहे हैं. काम अभी बहुत बाकी ही लेकिन दिशा ठीक है.
