बेलडांगा के रहने वाले बाबर अली रोज़ स्कूल से लौटते समय अपने हमउम्र बच्चों को खेतों में काम करते, कचरा बीनते और मजदूरों की मदद करते देखते थे। यह दृश्य उन्हें बेचैन करता था। एक दिन उन्होंने बच्चों से पूछा, “अगर मैं तुम्हें पढ़ाऊँ, तो क्या तुम पढ़ना चाहोगे?” बच्चों का जवाब था, “हाँ।” यही एक पल उनकी प्रेरणादायक यात्रा की शुरुआत बन गया।
साल 2002 में बाबर ने अपने घर के सामने अमरूद के पेड़ के नीचे टूटे हुए चॉक और पुराने बोर्ड की मदद से सिर्फ आठ बच्चों के साथ शाम की कक्षाएं शुरू कीं। उन्होंने इस पहल का नाम आनंद शिक्षा निकेतन रखा। बिजली नहीं थी, इसलिए पढ़ाई सूर्यास्त से पहले खत्म करनी पड़ती थी। बारिश में कक्षाएं रुक जाती थीं और मिट्टी की टाइल ही ब्लैकबोर्ड का काम करती थी। बाबर अपने स्कूल से बचे हुए चॉक लाते और अपनी जेब खर्च से टॉफियां खरीदकर बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित करते थे।
समय के साथ यह छोटी-सी पहल एक बड़े निःशुल्क शिक्षण संस्थान में बदल गई। पिछले दो दशकों में इसकी शैक्षणिक पहलों से 7,000 से अधिक बच्चे लाभान्वित हो चुके हैं। बाबर अली की कहानी इस बात का जीवंत उदाहरण है कि बदलाव लाने के लिए बड़ी उम्र या बड़े संसाधनों की नहीं, बल्कि मजबूत इरादों और शिक्षा के प्रति सच्चे समर्पण की जरूरत होती है।
