नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वीडियो सोशल मीडिया से हटाए जाने के मामले ने अब तूल पकड़ लिया है। इस मामले में केंद्र सरकार ने META के अधिकारियों को जवाब देने के लिए तलब किया है। META के हेड ऑफ पब्लिक पॉलिसी जोएल कपलान को 5 अगस्त को बुलाया गया है। इसके साथ ही इंस्टाग्राम के तकनीकी अधिकारियों से भी इस पूरे मामले को लेकर जानकारी मांगी जाएगी।
सरकार की नजर सिर्फ पीएम मोदी का वीडियो हटाए जाने के मामले पर ही नहीं है, बल्कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के एल्गोरिदम पर भी है। सरकार यह समझना चाहती है कि META जैसे बड़े प्लेटफॉर्म किस आधार पर किसी कंटेंट को ज्यादा लोगों तक पहुंचाते हैं और किस तरह की पोस्ट को ज्यादा तवज्जो मिलती है।
रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार के पास ऐसी शिकायतें पहुंची हैं जिनमें आरोप लगाया गया है कि कुछ सरकार विरोधी पोस्ट को सोशल मीडिया पर ज्यादा महत्व मिला। सरकार अब बड़ी टेक कंपनियों से कथित तकनीकी गड़बड़ियों को लेकर लिखित जवाब भी चाहती है।
इस पूरे विवाद के बीच प्रधानमंत्री मोदी का वीडियो हटाए जाने का मामला भी अहम है। संसदीय समिति की बैठक के दौरान META के अधिकारियों ने इस मामले में माफी मांगी थी। हालांकि, समिति ने यह सवाल भी उठाया कि आखिर ऐसी स्थिति पैदा ही क्यों हुई। समिति की ओर से META के ग्लोबल चीफ से भी इस गलती के लिए माफी मांगने की बात कही गई थी।
वहीं, इलेक्ट्रॉनिक और आईटी मामलों की संसदीय समिति के चेयरमैन निशिकांत दुबे ने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के एल्गोरिदम को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि META, X और YouTube के एल्गोरिदम को लेकर जो स्थिति बनी है, उसके बारे में देश को जानकारी होनी चाहिए।
निशिकांत दुबे ने सोशल मीडिया व्यूअरशिप के आंकड़ों का जिक्र करते हुए कहा कि बीजेपी, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और समाजवादी पार्टी की कुल सोशल मीडिया व्यूअरशिप 24 बिलियन है, जबकि एक एंटी-रिजर्वेशन फोरम की व्यूअरशिप 7 बिलियन बताई गई।
अब केंद्र सरकार द्वारा META अधिकारियों को तलब किए जाने के बाद यह मामला और गंभीर हो गया है। सरकार कथित तकनीकी गड़बड़ियों और सोशल मीडिया एल्गोरिदम पर जवाब मांगने के साथ-साथ प्रधानमंत्री मोदी का वीडियो हटाए जाने के मामले में META से लिखित माफी की मांग भी कर सकती है।
