ई-रिक्शा चलाने से NEET तक: मोहम्मद सुहैल ने मेहनत, अनुशासन और उम्मीद से लिखी सफलता की कहानी

कभी दिनभर ई-रिक्शा चलाकर परिवार की आर्थिक मदद करने वाला एक युवा आज डॉक्टर बनने के सपने की ओर बढ़ रहा है। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के मोहम्मद सुहैल की कहानी सिर्फ NEET में 609 अंक हासिल करने की कहानी नहीं है, बल्कि यह संघर्ष, पारिवारिक त्याग, शिक्षा के प्रति समर्पण और कभी हार न मानने की मिसाल है। उनकी यात्रा उन लाखों युवाओं के लिए उम्मीद की किरण है, जो सीमित संसाधनों के कारण अपने बड़े सपनों को असंभव समझने लगते हैं।

12वीं के बाद सामने आई आर्थिक चुनौती

मोहम्मद सुहैल का जन्म और पालन-पोषण मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश में एक निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ। उनके परिवार में अब तक किसी ने भी 12वीं कक्षा से आगे की पढ़ाई नहीं की थी। सुहैल ने वर्ष 2021 में अपनी 12वीं की शिक्षा पूरी की। उनके और उनके भाई, दोनों की इच्छा थी कि वे आगे की पढ़ाई जारी रखें, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति दोनों बच्चों की उच्च शिक्षा का खर्च उठाने की स्थिति में नहीं थी।

परिवार के सामने मुश्किल फैसला था। उनके भाई ने बीकॉम में दाखिला लिया, जबकि सुहैल ने परिवार की मदद करने के लिए अपने पिता का ई-रिक्शा चलाना शुरू कर दिया। दिन में वह सड़कों पर ई-रिक्शा चलाते और रात में किताबें खोलकर पढ़ाई करते। कई बार पढ़ाई आधी रात के बाद तक चलती थी। उनके पास सुविधाएं कम थीं, लेकिन लक्ष्य बड़ा था।

NEET के बारे में भी नहीं जानते थे

सुहैल की कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि शुरुआत में उन्हें NEET के बारे में जानकारी तक नहीं थी। एक दोस्त ने उन्हें बताया कि NEET के जरिए सरकारी मेडिकल कॉलेज में अपेक्षाकृत कम खर्च में MBBS की पढ़ाई करने का अवसर मिल सकता है। यह जानकारी उनके जीवन का निर्णायक मोड़ बनी।

सुहैल ने महसूस किया कि यदि वह NEET में सफल होते हैं, तो वे डॉक्टर बनने का अपना रास्ता बना सकते हैं और परिवार पर भारी आर्थिक बोझ भी नहीं पड़ेगा। उनकी मां की भी दिली इच्छा थी कि उनका बेटा डॉक्टर बने। धीरे-धीरे मां का सपना सुहैल का अपना लक्ष्य बन गया।

असफलता को बनाया सफलता की सीढ़ी

पहले प्रयास में सुहैल को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। लेकिन उन्होंने असफलता को अपनी मंजिल का अंत नहीं माना। सीमित आर्थिक संसाधनों के बावजूद उन्होंने सस्ती ऑनलाइन कोचिंग का सहारा लिया और PhysicsWallah के एक किफायती बैच से तैयारी शुरू की। बाद में मेरठ के PW विद्यापीठ सेंटर ने उन्हें मुफ्त प्रवेश, मार्गदर्शन और व्यवस्थित तैयारी का अवसर दिया। नियमित टेस्ट और अध्ययन सामग्री ने उनकी तैयारी को मजबूत किया।

एक समय ऐसा भी आया जब सुहैल लगभग NEET की तैयारी छोड़ने का मन बना चुके थे। लेकिन शिक्षकों के सहयोग ने उन्हें फिर संभाला। उनके शिक्षक हाशिर सर ने तो पढ़ाई के लिए अपना कमरा तक उपलब्ध कराया, क्योंकि सुहैल के घर में पढ़ने के लिए उचित माहौल नहीं था। यह सहयोग उनकी यात्रा में महत्वपूर्ण साबित हुआ।

तीसरे प्रयास में 609 अंक

लगातार मेहनत और सुधार के बाद सुहैल ने NEET UG में अपने तीसरे प्रयास में 609 अंक हासिल किए। उनकी लगभग 11,000 रैंक बताई गई है, जिससे उन्हें सरकारी मेडिकल कॉलेज में MBBS सीट मिलने की उम्मीद बनी। जिस परिवार में कभी डॉक्टर बनने का सपना भी नहीं देखा गया था, उसी परिवार में उनके परिणाम के दिन खुशी का माहौल था। परिवार के लोग भावुक थे और इस उपलब्धि को अपने वर्षों के त्याग का परिणाम मान रहे थे।

सुहैल की आगे की इच्छा चिकित्सा की पढ़ाई पूरी करने और भविष्य में सर्जरी के क्षेत्र में जाने की है। वह जानते हैं कि अभी उनके सामने लंबा सफर है, लेकिन NEET की सफलता ने उन्हें यह विश्वास जरूर दे दिया है कि मेहनत और सही दिशा से परिस्थितियों को बदला जा सकता है।

समय नहीं, लक्ष्य महत्वपूर्ण है

सुहैल की सफलता का सबसे बड़ा संदेश उनके पढ़ाई के तरीके में छिपा है। उन्होंने पढ़ाई के घंटों की गिनती करने के बजाय अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित किया। उनका सिद्धांत सरल था—जो काम शुरू करो, उसे पूरा करो। दिन में ई-रिक्शा चलाने और रात में पढ़ाई करने के बावजूद उन्होंने अपने लक्ष्य से समझौता नहीं किया।

उनकी कहानी यह भी बताती है कि सफलता केवल व्यक्तिगत मेहनत का परिणाम नहीं होती। इसमें परिवार का त्याग, मां का विश्वास, भाई का सहयोग, शिक्षकों का मार्गदर्शन और सही अवसर—सभी की भूमिका होती है। सुहैल के भाई ने भी परिवार की मदद के लिए अपनी पढ़ाई छोड़कर काम करना शुरू किया। यह त्याग सुहैल के लिए और अधिक मेहनत करने की प्रेरणा बना।

युवाओं के लिए देशभक्ति और उम्मीद का संदेश

मोहम्मद सुहैल की कहानी भारत के युवाओं के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश देती है—परिस्थितियां आपकी शुरुआत तय कर सकती हैं, लेकिन आपका भविष्य आपकी मेहनत, अनुशासन और संकल्प तय करते हैं।

आज देश को ऐसे ही युवाओं की जरूरत है, जो कठिनाइयों से भागने के बजाय उन्हें चुनौती समझकर आगे बढ़ें। शिक्षा केवल व्यक्तिगत सफलता का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का सबसे मजबूत आधार है। एक गरीब परिवार का बेटा जब डॉक्टर बनने की दिशा में आगे बढ़ता है, तो उसकी सफलता केवल उसके परिवार की नहीं होती; वह पूरे समाज और देश के लिए उम्मीद पैदा करती है।

सुहैल की यात्रा हमें सिखाती है कि संसाधन कम हों तो रास्ते खोजिए, असफलता मिले तो रणनीति बदलिए, लेकिन लक्ष्य मत छोड़िए। मेहनत में ईमानदारी, समय में अनुशासन, दिल में उम्मीद और देश के प्रति जिम्मेदारी—यही वह संयोजन है जो भारत के युवाओं को नई ऊंचाइयों तक ले जा सकता है।

मोहम्मद सुहैल ने ई-रिक्शा की ड्राइविंग सीट से मेडिकल कॉलेज की ओर अपनी यात्रा शुरू की है। उनकी कहानी हर उस भारतीय युवा से कहती है—सपने बड़े रखिए, मेहनत लगातार कीजिए और अपने देश की तरक्की में अपनी सफलता को योगदान में बदलिए। मुश्किलें चाहे जितनी बड़ी हों, अगर हौसला कायम है तो मंजिल दूर नहीं।

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