ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भारत का बड़ा संदेश: ‘इंसानियत सबसे पहले’, चार स्तंभों पर होगी वैश्विक सहयोग की नई पहल12-13 सितंबर को नई दिल्ली में होगा 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन, भारत की अध्यक्षता में मजबूती, नवाचार, सहयोग और सतत विकास पर रहेगा जोर

नई दिल्ली। भारत की मेजबानी में 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाला 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत ने वर्ष 2026 के लिए ब्रिक्स की अध्यक्षता का मूल मंत्र ‘इंसानियत सबसे पहले’ रखा है। इसके तहत भारत ब्रिक्स को केवल राजनीतिक और रणनीतिक मंच के बजाय विकास, तकनीक, आर्थिक सहयोग और वैश्विक सुधारों के लिए प्रभावी मंच बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

भारत ने अपनी अध्यक्षता के लिए चार प्रमुख स्तंभ तय किए हैं। इनमें मजबूती, नवाचार, सहयोग और सतत विकास शामिल हैं। इन चारों क्षेत्रों के जरिए भारत का प्रयास सदस्य देशों के बीच व्यावहारिक सहयोग बढ़ाने और विकासशील देशों की आवाज को वैश्विक स्तर पर अधिक प्रभावी बनाने का है।

संकट से निपटने के लिए सामूहिक मजबूती पर जोर:
भारत के पहले स्तंभ मजबूती के तहत स्वास्थ्य, कृषि, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा, आपदा प्रबंधन और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत बनाने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में दुनिया ने महामारी, युद्ध, ऊर्जा संकट और अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखला में आई बाधाओं का सामना किया है। ऐसे में भारत का मानना है कि ब्रिक्स देशों को भविष्य के आर्थिक और संस्थागत संकटों से निपटने के लिए अपनी सामूहिक क्षमता बढ़ानी होगी। भारत की कोशिश है कि सदस्य देश एक-दूसरे के अनुभव और संसाधनों का इस्तेमाल करते हुए संकट के समय अधिक प्रभावी ढंग से साथ खड़े हो सकें।

तकनीक का लाभ आम लोगों तक पहुंचाने की कोशिश:
दूसरा प्रमुख स्तंभ नवाचार है। इसके तहत कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल सार्वजनिक ढांचा, वित्तीय तकनीक, नए उद्यम, छोटे और मध्यम उद्योग, विज्ञान तथा उन्नत तकनीक के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। भारत का विशेष जोर ऐसी तकनीकों पर है, जिनका लाभ केवल विकसित अर्थव्यवस्थाओं तक सीमित न रहे, बल्कि विकासशील देशों और आम नागरिकों तक भी पहुंचे। भारत अपने डिजिटल सार्वजनिक ढांचे के अनुभव को ब्रिक्स के अन्य देशों के साथ साझा करने की दिशा में भी काम कर रहा है। इससे डिजिटल सेवाओं, वित्तीय पहुंच और सरकारी योजनाओं की पहुंच को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।

वैश्विक संस्थाओं में सुधार की मांग:
तीसरा स्तंभ सहयोग है। इसके तहत बहुपक्षीय व्यवस्था को मजबूत करने, वैश्विक संस्थाओं में सुधार करने, व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने तथा विकासशील देशों को वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में उचित प्रतिनिधित्व दिलाने पर जोर दिया जा रहा है। भारत लंबे समय से यह बात उठाता रहा है कि दुनिया की बदलती आर्थिक और जनसंख्या संबंधी वास्तविकताओं के अनुरूप वैश्विक संस्थाओं की संरचना में भी बदलाव होना चाहिए। ब्रिक्स के विस्तार के बाद इस मांग को और अधिक व्यापक समर्थन मिलने की संभावना है।

पर्यावरण के साथ विकास का संतुलन:
चौथा स्तंभ सतत विकास है। इसके तहत स्वच्छ और नवीकरणीय ऊर्जा, जलवायु परिवर्तन से निपटने के उपाय, हरित वित्त और टिकाऊ विकास को आगे बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। भारत के सामने चुनौती यह भी है कि आर्थिक विकास की गति को बनाए रखते हुए पर्यावरण की रक्षा कैसे की जाए। ऐसे में ब्रिक्स देशों के बीच स्वच्छ ऊर्जा और हरित तकनीक के क्षेत्र में सहयोग महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

25 से अधिक शहरों में हुईं 350 से ज्यादा बैठकें:
भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के दौरान अब तक देश के 25 से अधिक शहरों में 350 से ज्यादा बैठकें और उच्चस्तरीय कार्यक्रम आयोजित किए जा चुके हैं। इन कार्यक्रमों में राजनीतिक और सुरक्षा, आर्थिक और वित्तीय तथा सांस्कृतिक और जनसंपर्क से जुड़े विषयों पर चर्चा हुई है। इससे स्पष्ट है कि भारत ने ब्रिक्स अध्यक्षता को केवल नई दिल्ली में होने वाले शिखर सम्मेलन तक सीमित नहीं रखा है, बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों को इससे जोड़ने का प्रयास किया है।

ब्रिक्स के 20 वर्ष पूरे, विस्तार के बाद 11 सदस्य:
वर्ष 2026 ब्रिक्स के लिए ऐतिहासिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। इस वर्ष ब्रिक्स की स्थापना के 20 वर्ष पूरे हो रहे हैं। समय के साथ इस समूह का विस्तार हुआ है और अब इसमें 11 पूर्ण सदस्य देश शामिल हैं। इन देशों की संयुक्त आबादी और अर्थव्यवस्था का वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण हिस्सा है। विश्व व्यापार में भी इनकी भूमिका लगातार बढ़ी है। इसी कारण ब्रिक्स अब केवल उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह नहीं रह गया है। यह विकासशील देशों की आकांक्षाओं और वैश्विक व्यवस्था में सुधार की मांग को सामने रखने वाला महत्वपूर्ण मंच बन चुका है।

सिर्फ भू-राजनीति नहीं, विकास का मंच बनाने की कोशिश:
नई दिल्ली में होने वाला शिखर सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जब दुनिया कई तरह के तनावों से गुजर रही है। ऐसे में भारत की प्राथमिकता ब्रिक्स को केवल शक्ति संतुलन और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का मंच बनाने के बजाय व्यावहारिक सहयोग और विकास का मंच बनाना है। भारत के सामने हालांकि चुनौती भी कम नहीं है। ब्रिक्स के सभी सदस्य देशों के अपने-अपने राष्ट्रीय हित और अलग-अलग राजनीतिक प्राथमिकताएं हैं। ऐसे में साझा एजेंडे पर सहमति बनाना आसान नहीं होगा। इसके बावजूद स्वास्थ्य, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा, तकनीक, व्यापार, जलवायु परिवर्तन और विकास जैसे मुद्दे ऐसे हैं, जिन पर व्यापक सहयोग की संभावनाएं मौजूद हैं।

‘इंसानियत सबसे पहले’ कितना असरदार होगा?
भारत की अध्यक्षता का मूल संदेश ‘इंसानियत सबसे पहले’ है। इसका उद्देश्य यह बताना है कि वैश्विक सहयोग का अंतिम लक्ष्य केवल आर्थिक या राजनीतिक शक्ति बढ़ाना नहीं, बल्कि आम लोगों के जीवन को बेहतर बनाना भी होना चाहिए। नई दिल्ली शिखर सम्मेलन में भारत इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए ब्रिक्स को विकास, तकनीकी सहयोग, आर्थिक साझेदारी और वैश्विक सुधारों का प्रभावी मंच बनाने की कोशिश करेगा।

ब्रिक्स के 20 वर्ष पूरे होने के अवसर पर नई दिल्ली से भारत का संदेश स्पष्ट है—बदलती दुनिया में विकासशील देशों की आवाज मजबूत हो और वैश्विक सहयोग का केंद्र केवल शक्ति नहीं, बल्कि इंसानियत भी हो।

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