नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच यमन के हूती विद्रोहियों की लाल सागर के तट पर बढ़ती सैन्य पकड़ ने दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति को लेकर नई चिंता पैदा कर दी है। हूतियों ने हाल में यमन के महत्वपूर्ण बंदरगाह शहर मोखा पर कब्जा करने के बाद बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के बेहद करीब रणनीतिक मायून यानी पेरिम द्वीप पर भी नियंत्रण स्थापित कर लिया है। इससे इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
बाब-अल-मंदेब लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ने वाला बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। एशिया और यूरोप के बीच होने वाले व्यापार के लिए इसकी अहम भूमिका है। पहले से ही हूती हमलों के कारण इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों की संख्या में भारी गिरावट आई है। अब हूतियों की रणनीतिक इलाकों में बढ़ती मौजूदगी से जहाजरानी कंपनियों के लिए जोखिम और बढ़ गया है। भारत के लिए यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पश्चिम एशिया से आने वाली ऊर्जा आपूर्ति के समुद्री रास्तों पर संकट बढ़ने का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। यदि तेल टैंकरों को बाब-अल-मंदेब से बचकर लंबे वैकल्पिक मार्ग अपनाने पड़ते हैं, तो परिवहन का समय और लागत दोनों बढ़ सकते हैं।
पश्चिम एशिया में पहले से ही अस्थिर हालात के बीच बाब-अल-मंदेब पर बढ़ते खतरे ने अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार की चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्टों के मुताबिक, ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत इस सप्ताह 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर से ऊपर चली गई और करीब 108 डॉलर तक पहुंची। अगर बाब-अल-मंदेब से तेल और मालवाहक जहाजों की आवाजाही लंबे समय तक बाधित रहती है, तो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव बढ़ सकता है। इसका असर कच्चे तेल की कीमतों के साथ-साथ समुद्री परिवहन और बीमा लागत पर भी पड़ सकता है।
बाब-अल-मंदेब में अस्थिरता का असर केवल तेल आपूर्ति तक सीमित नहीं रहेगा। लाल सागर और स्वेज नहर के रास्ते एशिया-यूरोप के बीच सामान पहुंचाने वाली कंपनियों को वैकल्पिक और लंबे समुद्री रास्तों का इस्तेमाल करना पड़ सकता है। पहले से ही हूती हमलों के कारण इस मार्ग पर समुद्री यातायात में करीब 60 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। ऐसे में भारत के सामने चुनौती दोहरी है—एक तरफ ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखना और दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती तेल कीमतों के असर को नियंत्रित करना।
अगर हूतियों की पकड़ बाब-अल-मंदेब पर और मजबूत होती है और समुद्री यातायात बाधित होता है, तो भारत समेत एशियाई देशों के लिए ऊर्जा सुरक्षा की चुनौती और गंभीर हो सकती है। यानी यमन का यह संघर्ष अब सिर्फ पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहा—इसकी लपटें वैश्विक तेल बाजार और भारत की अर्थव्यवस्था तक पहुंच सकती हैं।
