मक्का समझौता – पाकिस्तान के ‘इस्लामिक नाटो’ अपने पहले ही इम्तेहान मे फेल

मक्का पैक्ट के समय पाकिस्तान ने बड़े-बड़े दावे किए थे। मुस्लिम एकता की बातें हुईं। कलेक्टिव सुरक्षा की बातें हुईं। और फिर पेश किया गया मक्का रक्षा समझौता—मानो मुस्लिम देशों के लिए यह कोई नया सुरक्षा कवच हो। लेकिन अब इस समझौते की असली तस्वीर सामने आती दिखाई दे रही है।

पहली परीक्षा हुई… और पाकिस्तान की आवाज ही धीमी पड़ गई! पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने जोरदार बयान दिया था कि अगर हूती विद्रोही सऊदी अरब पर हमला करते हैं, तो मक्का समझौते के तहत सामूहिक रक्षा की स्थिति पैदा हो सकती है। यानी पाकिस्तान का संदेश था— सऊदी अरब पर हमला हुआ तो पाकिस्तान चुप नहीं बैठेगा। लेकिन फिर सऊदी अरब पर हूतियों की ओर से मिसाइलें दागी गईं। और इसके बाद क्या हुआ?

पाकिस्तान ने कदम आगे बढ़ाने के बजाय कदम पीछे खींच लिए। इस्लामाबाद के विदेश मंत्रालय की ओर से सफाई आने लगी कि किसी सैन्य प्रतिक्रिया पर चर्चा तक नहीं हुई। तो फिर सवाल पाकिस्तान से है— जनाब, कलेक्टिव डिफेन्स का वादा किसलिए किया था? अगर पहली ही चुनौती पर मिलिटरी इन्टर वेनशन की बात तक नहीं हुई, तो फिर यह समझौता आखिर किस काम का है?

क्या यह सिर्फ कागज पर बना एक सुरक्षा समझौता है? या फिर पाकिस्तान की वही पुरानी रणनीति— बयान में शेर, लेकिन संकट आते ही खामोशी! पाकिस्तान लंबे समय से मुस्लिम एकता और मुस्लिम देशों की सामूहिक ताकत की बातें करता रहा है। लेकिन असली सवाल यह है कि जब इस एकता की परीक्षा होती है, तब पाकिस्तान कहां खड़ा होता है? यहां मामला और भी दिलचस्प है। एक तरफ सऊदी अरब है—मक्का समझौते का प्रमुख पक्ष। दूसरी तरफ हूती विद्रोही हैं, जिन्हें व्यापक रूप से ईरान समर्थित समूह माना जाता है। और शायद यहीं पाकिस्तान की असली मजबूरी दिखाई देती है।

सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौता… और ईरान के साथ रिश्ते भी खराब नहीं करने! नतीजा? बयान कुछ और, कार्रवाई कुछ और! पाकिस्तान को समझना होगा कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सिर्फ नारे और घोषणाएं काम नहीं करतीं। किसी भी रक्षा समझौते की असली ताकत तब सामने आती है, जब उसके किसी सदस्य पर हमला हो। और अब वही क्षण सामने है। सऊदी अरब पर हमला हुआ। लेकिन जिस पाकिस्तान ने सामूहिक रक्षा की बात की थी, वही पाकिस्तान अब सफाई देता नजर आ रहा है कि सैन्य कार्रवाई पर कोई चर्चा ही नहीं हुई। तो क्या मक्का समझौता अपनी पहली ही परीक्षा में फेल हो गया? या फिर पाकिस्तान ने खुद साबित कर दिया कि उसका तथाकथित ‘इस्लामिक नाटो’ असल में सिर्फ राजनीतिक भाषणों का गठजोड़ है?

आखिरी सवाल पाकिस्तान से— अगर सऊदी अरब पर मिसाइलें गिरने के बाद भी सामूहिक रक्षा लागू नहीं होगी, तो फिर यह समझौता आखिर किस दिन लागू होगा? क्योंकि दुनिया अब बयान नहीं देख रही। दुनिया कार्रवाई देख रही है। और पहली परीक्षा में पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है— “मक्का समझौता मजबूत है… या पाकिस्तान का दावा सिर्फ खोखला?”

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