एक पत्रकार, एक विवादित मुक़दमा, सियासत के केंद्र में आया गोरखपुर और ज़िंदगी के आख़िरी आठ साल जेल में गुज़ारने वाला एक शख़्स—परवेज़ परवाज़ की कहानी कई सवाल पीछे छोड़ गई है। 72 वर्षीय पूर्व पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता परवेज़ परवाज़ की अक्टूबर 2026 में गोरखपुर ज़िला जेल में सज़ा काटने के दौरान मौत हो गई। जेल प्रशासन के मुताबिक़, वह मधुमेह और उच्च रक्तचाप समेत कई बीमारियों से पीड़ित थे। तबीयत बिगड़ने पर उन्हें ज़िला अस्पताल ले जाया गया, जहाँ इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। उनकी मौत की ख़बर सामने आते ही 2007 के गोरखपुर दंगों और उत्तर प्रदेश के मौजूदा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से जुड़े उस पुराने मुक़दमे की चर्चा फिर शुरू हो गई, जिसने परवाज़ को राष्ट्रीय स्तर पर सुर्ख़ियों में ला दिया था।
2007: जब गोरखपुर की सियासत में आया एक पत्रकार
जनवरी 2007 में गोरखपुर में मुहर्रम के जुलूस के दौरान हुई हिंसा के बाद तत्कालीन भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ का नाम एक विवाद में सामने आया। परवेज़ परवाज़ ने आरोप लगाया कि योगी आदित्यनाथ ने 27 जनवरी 2007 को एक सार्वजनिक सभा में भड़काऊ भाषण दिया था। इस भाषण को लेकर उन्होंने कानूनी कार्रवाई की मांग की और अदालत के माध्यम से प्राथमिकी दर्ज कराने की प्रक्रिया शुरू की। यह मामला केवल एक व्यक्ति के ख़िलाफ़ शिकायत तक सीमित नहीं रहा। इसमें राजनीतिक भाषणों की जवाबदेही, सांप्रदायिक तनाव के दौरान नेताओं की भूमिका और क़ानून के सामने सभी की समानता जैसे सवाल भी उठे। परवाज़ का आरोप था कि भाषण की जांच होनी चाहिए और क़ानून के मुताबिक़ कार्रवाई की जानी चाहिए। हालांकि, आरोप और अदालत में साबित हुआ अपराध अलग-अलग बातें हैं। योगी आदित्यनाथ के ख़िलाफ़ इस मामले में कोई दोषसिद्धि नहीं हुई।
सीडी विवाद और मुक़दमे का बदलता रुख़
मामले में कथित भाषण की एक सीडी को साक्ष्य के तौर पर पेश किए जाने को लेकर विवाद पैदा हुआ। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, सीडी की जांच में उसमें छेड़छाड़ किए जाने की बात सामने आई। इसके बाद सीडी से जुड़े मामले में परवेज़ परवाज़ के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई हुई। इस विवाद ने मामले को और पेचीदा बना दिया। एक तरफ़ योगी आदित्यनाथ के कथित भाषण की जांच और कार्रवाई की मांग थी, तो दूसरी तरफ़ साक्ष्य की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे। 2017 में उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार बनने के बाद योगी आदित्यनाथ के ख़िलाफ़ अभियोजन की अनुमति नहीं दी गई। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के इस निर्णय को बरक़रार रखा और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दायर अपील ख़ारिज कर दी। इस तरह परवाज़ द्वारा उठाया गया सवाल कानूनी प्रक्रिया के ज़रिये आगे बढ़ा, लेकिन योगी आदित्यनाथ के ख़िलाफ़ आपराधिक दोषसिद्धि तक नहीं पहुँचा।
रासुका के तहत कार्रवाई और कानूनी विवाद
2007 के गोरखपुर घटनाक्रम के दौरान परवेज़ परवाज़ के ख़िलाफ़ राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून (रासुका) के तहत भी कार्रवाई हुई थी। वह उस समय के विवादों और मुक़दमों के कारण लगातार चर्चा में रहे। उनके मामले को लेकर एक बड़ा सवाल यह है कि सांप्रदायिक तनाव और राजनीतिक टकराव से जुड़े मामलों में पुलिस कार्रवाई, साक्ष्यों की विश्वसनीयता और न्यायिक समीक्षा की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी होनी चाहिए।
2018 का मामला और उम्रकैद की सज़ा
परवेज़ परवाज़ की ज़िंदगी में जून 2018 एक अलग कानूनी मोड़ लेकर आया। एक महिला ने उन पर और महमूद उर्फ़ जुम्मन बाबा पर सामूहिक दुष्कर्म का आरोप लगाते हुए प्राथमिकी दर्ज कराई। महिला ने आरोप लगाया कि उसे झाड़-फूंक के बहाने बुलाया गया और फिर हथियार के बल पर उसके साथ दुष्कर्म किया गया। इस मामले में सुनवाई के बाद गोरखपुर की ज़िला एवं सत्र अदालत ने जुलाई 2020 में दोनों आरोपियों को दोषी ठहराया और आजीवन सश्रम कारावास की सज़ा सुनाई। परवाज़ सितंबर 2018 से जेल में बंद थे।
इस दोषसिद्धि को उनकी कहानी का अनिवार्य हिस्सा मानना होगा। उनके पुराने राजनीतिक मुक़दमे पर सवाल उठाना एक बात है, जबकि अदालत द्वारा सुनाए गए दूसरे मामले के फ़ैसले को नज़रअंदाज़ करना दूसरी। किसी भी व्यक्ति के साथ न्याय की पड़ताल तथ्यों के आधार पर ही होनी चाहिए।
जेल में मौत: बीमारी, इलाज और जवाबदेही का सवाल
अक्टूबर 2026 में परवाज़ की तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें गोरखपुर ज़िला अस्पताल ले जाया गया। जेल प्रशासन के अनुसार, वह लंबे समय से बीमार थे और उन्हें मधुमेह तथा उच्च रक्तचाप जैसी समस्याएँ थीं। अस्पताल में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। उनकी मौत के बारे में उपलब्ध रिपोर्टें स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का उल्लेख करती हैं। फिलहाल, उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि उनकी मौत राजनीतिक प्रतिशोध, जेल में जानबूझकर इलाज न मिलने या किसी साज़िश का परिणाम थी। फिर भी, किसी भी क़ैदी की हिरासत में मौत होने पर समय पर चिकित्सा सहायता, इलाज के रिकॉर्ड और संबंधित प्रक्रियाओं की पारदर्शिता महत्वपूर्ण सवाल होते हैं। इन सवालों का जवाब आधिकारिक रिकॉर्ड और स्वतंत्र जांच से ही मिल सकता है।
