नई दिल्ली: आज सिरिल रामाफोसा दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति हैं और नई दिल्ली में आयोजित BRICS शिखर सम्मेलन में वैश्विक नेताओं के साथ नजर आ रहे हैं। लेकिन उनका यहां तक पहुंचने का सफर आसान नहीं था। इसके पीछे गरीबी, रंगभेद के खिलाफ संघर्ष, गिरफ्तारियां और जेल की कठिन जिंदगी की लंबी कहानी है। रामाफोसा का जन्म 1952 में जोहान्सबर्ग के सोवेटो इलाके में हुआ था। उनके पिता पुलिस कांस्टेबल थे। स्कूल के दिनों से ही वे नेतृत्व और सामाजिक मुद्दों में सक्रिय रहे।
1972 में उन्होंने कानून की पढ़ाई शुरू की। उस दौर में दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद की व्यवस्था लागू थी और अश्वेत छात्रों की राजनीतिक गतिविधियों पर कड़ी निगरानी रखी जाती थी। 1974 में एक राजनीतिक रैली में शामिल होने के कारण रामाफोसा को गिरफ्तार कर लिया गया और करीब 11 महीने तक एकांत कारावास में रखा गया। 1976 के सोवेटो छात्र विद्रोह के बाद उन्हें दोबारा गिरफ्तार किया गया और जेल भेजा गया। लेकिन जेल और राजनीतिक उत्पीड़न भी उनकी पढ़ाई का जुनून नहीं तोड़ सके। उन्होंने पत्राचार के माध्यम से कानून की पढ़ाई जारी रखी और 1981 में कानून की डिग्री हासिल की।
डिग्री हासिल करने के बाद रामाफोसा ने मजदूरों के अधिकारों के लिए काम किया। वे दक्षिण अफ्रीका के खदान मजदूरों के बड़े ट्रेड यूनियन के प्रमुख नेताओं में शामिल हुए और रंगभेद सरकार के खिलाफ मजदूर आंदोलन को मजबूत किया। बाद में वे नेल्सन मंडेला के करीबी सहयोगियों में शामिल हुए और दक्षिण अफ्रीका में लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राजनीति के बाद रामाफोसा ने कारोबार में भी सफलता हासिल की। इसके बाद वे दोबारा सक्रिय राजनीति में लौटे और 2018 में दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति बने। एक ऐसा व्यक्ति जिसने जेल की कोठरी में पढ़ाई जारी रखी, वही आज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण बहुपक्षीय मंचों में से एक BRICS में अपने देश का नेतृत्व कर रहा है।
