हिंदुस्तान की तहरीक-ए-आज़ादी में डॉ. मुख़्तार अंसारी का नाम सुनहरे हरफ़ों में लिखा जाता है। एक कामयाब सर्जन होने के बावजूद उन्होंने अपनी ज़िन्दगी का बड़ा हिस्सा क़ौम और वतन के लिए समर्पित कर दिया।
सन 1910 में दिल्ली आकर उन्होंने अपना असपताल बनाया जहाँ ग़रीबों का मुफ़्त इलाज करते थे। यही वजह थी कि गांधी जी ने उन्हें “ग़रीबों का मसीहा” कहा। लेकिन डॉ. अंसारी का मिशन सिर्फ़ इलाज तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने आज़ादी-ए-वतन की जंग में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
वह ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के जनरल-सेक्रेटरी रहे और सन 1927 में कांग्रेस के सदर भी बने। इसके अलावा उन्होंने जामिया मिल्लिया इस्लामिया की तरक़्क़ी के लिए भी अहम किरदार अदा किया और उसे मज़बूत बुनियाद दी। उनकी कोठी हमेशा आज़ादी के रहनुमाओं और कारकुनों की पनाहगाह रही।
तहरीक-ए-ख़िलाफ़त से लेकर अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ हर मोर्चे पर उन्होंने बेबाकी से आवाज़ बुलंद की। क़ैद-ओ-बंदी की मुश्किलात झेलीं मगर अपने जज़्बे से कभी पीछे नहीं हटे।
10 मई 1936 को जब उनका इंतिक़ाल हुआ तो पूरा मुल्क मातम में डूब गया। उन्हें दिल्ली के जामिया मिल्लिया में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया। डॉ. मुख़्तार अंसारी की ज़िन्दगी हिंदुस्तान की तहरीक-ए-आज़ादी का वो बाब है जो आने वाली नस्लों को हमेशा जज़्बा और हिम्मत देता रहेगा।
