अगर अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप फिर से राष्ट्रपति बने, तो भारत के IT और फार्मा सेक्टर पर इसका बड़ा असर पड़ सकता है। ट्रंप पहले भी H-1B वीज़ा, दवा निर्यात और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर जैसे मुद्दों पर सख्त रुख अपना चुके हैं। अब दोबारा उनकी टैरिफ और व्यापार नीति चर्चा में है, जिससे भारत की कंपनियां चिंता में हैं।
भारतीय IT कंपनियां जैसे TCS, Infosys और Wipro अमेरिका में अपने हजारों कर्मचारियों को H-1B वीज़ा के जरिए भेजती हैं। ट्रंप के पिछले कार्यकाल (2017-2021) में इस वीज़ा को लेकर सख्ती की गई थी। इससे भारतीय इंजीनियरों को अमेरिका जाकर काम करने में मुश्किलें आई थीं।
अगर वही नीति दोबारा लागू होती है, तो भारतीय टेक कंपनियों को नुकसान हो सकता है।
USCIS (यूएस सिटिजनशिप एंड इमिग्रेशन सर्विस) के अनुसार 2020 में H-1B वीज़ा आवेदन में 30% की गिरावट आई थी।
भारत अमेरिका को सबसे ज्यादा जेनेरिक दवाइयाँ भेजता है। लेकिन ट्रंप प्रशासन पहले भी दवाइयों की कीमतों को लेकर विदेशों पर दबाव बना चुका है। अगर फिर से दवा निर्यात पर टैरिफ लगाया गया, तो Sun Pharma, Dr. Reddy’s, और Cipla जैसी कंपनियों को नुकसान हो सकता है।
अमेरिका की USTR (US Trade Representative) रिपोर्ट के अनुसार, भारत अमेरिकी दवा बाजार का एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता है।
अब टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और डेटा सुरक्षा पर सवाल उठता है की, ट्रंप पहले भी चीन और दूसरे देशों के साथ डेटा और टेक्नोलॉजी शेयरिंग पर सख्ती दिखा चुके हैं। अगर भारत के साथ भी ऐसी ही नीतियां लागू होती हैं, तो भारतीय कंपनियों के लिए R&D और तकनीकी साझेदारी में दिक्कतें आ सकती हैं।
निष्कर्ष:
अगर ट्रंप दोबारा सत्ता में आते हैं, तो उनकी “America First” नीति भारत के IT और फार्मा सेक्टर के लिए चुनौती बन सकती है। हालांकि भारत ने अन्य देशों में भी अपने व्यापार को फैलाया है, लेकिन अमेरिका अब भी इन क्षेत्रों का सबसे बड़ा बाजार है।
