भारत के पाँचवें राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद सिर्फ़ एक कामयाब सियासतदान ही नहीं बल्कि जंग-ए-आज़ादी के पुरजोश सिपाही भी थे।इनकी पैदाइश 13 मई 1905 को दिल्ली में हुई। तालीम का आग़ाज़ दिल्ली से हुआ, फिर लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज में पढ़ाई की। बाद में इंग्लैंड की कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से क़ानून की तालीम लेकर 1932 में बैरिस्टर बने।
वतन वापसी के बाद 1935 में कांग्रेस में शामिल हुए और जंग-ए-आज़ादी में सक्रिय किरदार अदा किया। 1942 के भारत छोड़ो तहरीक में गिरफ़्तार हुए और तीन साल कैद में रहे। रिहाई के बाद भी आज़ादी की तहरीक में अपना सफ़र जारी रखा और अंग्रेज़ हुकूमत के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करते रहे।
आज़ादी के बाद 1947 में असम प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के सदर बने। 1946 और 1952 में असम असेंबली के मेंबर चुने गए। 1966 में मरकज़ी वज़ारत में शामिल होकर ज़िराअत (कृषि) तालीम और क़ानून जैसे अहम महकमों की ज़िम्मेदारी संभाली।
1974 में मुल्क के राष्ट्रपति बने और 11 फ़रवरी 1977 को इसी ओहदे पर रहते हुए इंतक़ाल कर गए।
फ़ख़रुद्दीन अली अहमद की ज़िंदगी इस बात की शानदार मिसाल है कि किस तरह एक शख़्स ने क़ानून और सियासत दोनों मैदानों में मुल्क की आज़ादी और तरक़्क़ी के लिए ख़िदमत अंजाम दी। उनका नाम हमेशा जंग-ए-आज़ादी के बहादुर सिपाहियों में शुमार रहेगा
