असग़री बेगम का जन्म 1811 में थाना भवन (मुज़फ्फरनगर) में हुआ। आप मशहूर आलिम शाह अब्दुल रहीम की बेटी थीं। बचपन से ही आपके अंदर हिम्मत और जज़्बा कूट-कूट कर भरा था। 1857 की जंग-ए-आज़ादी में आपने बेख़ौफ़ होकर हिस्सा लिया। उस वक़्त औरतों का मैदान-ए-जंग में उतरना आम नहीं था, लेकिन असग़री बेगम रिवायतों को तोड़ते हुए अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ सीना तान कर खड़ी हो गईं।
आपने ना सिर्फ़ अपने घर के मर्दों का साथ दिया, बल्कि ख़ुद भी हथियार उठाए और बाग़ियों को मदद व हौसला दिया। असग़री बेगम लोगों के दिलों में आज़ादी की लौ जगाने वाली ख़ातून थीं। उनकी बहादुरी और क़ियादत ने आस-पास के लोगों में एक नया हौसला पैदा किया। अंग्रेज़ उनकी शोहरत और असर से ख़ौफ़ खाते थे, क्योंकि वो जानते थे कि असग़री बेगम सिर्फ़ एक शख़्स नहीं बल्कि एक जज़्बा हैं।
1857 की लड़ाई में उनकी कोशिशों ने यह साबित कर दिया कि औरतें भी मर्दों के साथ क़दम-से-क़दम मिलाकर आज़ादी की लड़ाई लड़ सकती हैं। असग़री बेगम का नाम इतिहास में उन बहादुर ख़वातीन में शामिल है, जिन्होंने अपनी जान, माल और आराम सब कुछ कुर्बान कर दिया लेकिन गुलामी को मंज़ूर नहीं किया।
उनकी ज़िंदगी आने वाली नस्लों के लिए यह पैग़ाम देती है कि हिम्मत, इरादा और जज़्बा हो तो कोई ताक़त आज़ादी की राह में रुकावट नहीं बन सकती।
