1857 की आज़ादी की जंग में नवाब वलीदाद ख़ान का किरदार बहुत अहम रहा। 26 जून 1857 को उन्होंने बादशाह बहादुरशाह ज़फ़र को ग़ाज़ियाबाद से मदद का पैग़ाम भेजा और अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ खुलकर मैदान में उतरे।
वलीदाद ख़ान ने अपने इलाक़े में सिपाहियों की टुकड़ियाँ तैयार कीं और आस-पास के इलाक़ों में बग़ावत को मज़बूत किया। उनका असर सिर्फ़ ग़ाज़ियाबाद तक नहीं बल्कि मेरठ और दिल्ली तक फैल गया। उन्होंने वहाँ के क्रांतिकारियों को भी हौसला और मदद दी।
20 जुलाई 1857 को नवाब वलीदाद ख़ान ने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ सीधी लड़ाई लड़ी। उनकी अगुवाई में कई झड़पें हुईं जिनसे अंग्रेज़ी हुकूमत को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा। अंग्रेज़ों ने चालाकी से उन्हें दबाने की कोशिश की, लेकिन उनकी बहादुरी और क़ुर्बानी हमेशा याद की जाती है।
नवाब वलीदाद ख़ान का नाम उन बहादुर सिपाहियों में शामिल है जिन्होंने न सिर्फ़ ग़ाज़ियाबाद बल्कि पूरे उत्तर भारत में आज़ादी की लौ जलाई। उनका जज़्बा और जंग हमेशा हिंदुस्तान के इतिहास में अमर रहेगा।
